आगरा २० मई ।
आगरा के नौफरी गाँव में 14 मई को महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर हुई कथित पुलिस बर्बरता के खिलाफ उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई गई है। आरोप है कि एसीपी ताज सुरक्षा सईद अरीब अहमद के निर्देश पर पुलिसकर्मियों ने 11 हिंदू लड़कों को उनके घरों से गिरफ्तार कर एकता पुलिस चौकी पर अमानवीय तरीके से मारा-पीटा और जेल भेज दिया।
क्या है पूरा मामला ?
घटना 14 मई की है, जब नौफरी गाँव में महाराणा प्रताप के बोर्ड का उद्घाटन किया गया था। इस घटना के बाद, 17 मई को समाचार पत्रों में खबरें प्रकाशित हुईं और सोशल मीडिया पर इससे संबंधित वीडियो और खबरें भी सामने आईं। इन्हीं के आधार पर क्षत्रिय शक्तिपीठ विकास ट्रस्ट ने उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग में एसीपी ताज सुरक्षा सईद अरीब अहमद और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। इस शिकायत का केस संख्या-10375/24/1/2025 है।
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ट्रस्ट के अध्यक्ष और अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने बताया कि भारत के किसी भी कानून में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के साथ बर्बरतापूर्वक मारपीट करने का प्रावधान नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन हिंदू युवाओं को अमानवीय तरीके से यातनाएं दी गईं, और उन्होंने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच व कार्रवाई की मांग की है।
खेरागढ़ का मामला भी आया सामने
अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने खेरागढ़ में हुई एक ऐसी ही घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि एसीपी खेरागढ़ इमरान अहमद के इशारे पर विवेक सिकरवार नाम के एक हिंदू युवा को जेल भेजा गया था।
पुलिस ने आरोप लगाया था कि विवेक सिकरवार कोई संज्ञेय अपराध कर सकता है, जबकि तलाशी में उसके पास से केवल एक मोबाइल फोन मिला था। अजय प्रताप सिंह ने सवाल उठाया कि एक व्यक्ति जिसके पास केवल मोबाइल है, वह संज्ञेय अपराध कैसे कर सकता है।
उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि हम ब्रिटिश शासन में जी रहे हैं, जहाँ पुलिस किसी को भी कभी भी गिरफ्तार कर, मारपीट कर जेल भेज सकती है, और जमानत के लिए भी पुलिस की दया पर निर्भर रहना पड़ता है।
उन्होंने इसे “बिना वकील, बिना दलील, बिना अपील” वाला कानून बताया, जहाँ न्यायालय की कोई भूमिका नहीं दिखती। विवेक सिकरवार को विधि विरुद्ध जेल भेजने के संबंध में भी मानवाधिकार आयोग में एसीपी खेरागढ़ और पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायत (केस संख्या-10330/24/1/2025) दर्ज कराई गई है।
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अजय प्रताप सिंह ने जोर देकर कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र में पुलिस का यह रवैया स्वीकार्य नहीं है, और वे मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ेंगे।
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