आगरा:
जनपद की एडीजे फास्ट ट्रैक कोर्ट माननीय बी. नारायणन ने अपहरण और दुराचार के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है।
इसके साथ ही, अदालत ने अलग-अलग स्तरों पर विरोधाभासी बयान देने और न्यायालय को गुमराह करने के लिए पीड़िता के विरुद्ध ही विधिक कार्रवाई करने के आदेश जारी किए हैं।
मामले का संक्षिप्त विवरण:
थाना लोहामंडी में दर्ज मुकदमे के अनुसार, वादी ने शिकायत की थी कि उसकी 18 वर्षीया पुत्री 15 दिसंबर को घर से लापता हो गई थी।
आरोप था कि ग्राम धनौली निवासी करन पुत्र देवेंद्र उसे बहला-फुसलाकर भगा ले गया है। पुलिस ने तहरीर के आधार पर अपहरण का मुकदमा दर्ज किया था।
पीड़िता के पूर्व बयान और 8 माह बाद वापसी:
घटना के करीब 8 माह बाद पीड़िता स्वयं घर वापस लौटी।
उसने पुलिस, डॉक्टर और मजिस्ट्रेट के समक्ष गंभीर आरोप लगाते हुए बताया था कि:
* आरोपी करन और उसके साथियों ने उसे कार में अगवा कर बेंगलुरु ले गए।
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* वहां उसे किराए के मकान में रखकर बंधक बनाया गया और उसके साथ दुराचार (rape) किया गया।
* बाद में उसे ‘रोहता की गढ़ी’ लाया गया, जहाँ से वह मौका पाकर भाग निकली।
इन बयानों के आधार पर पुलिस ने मुकदमे में दुराचार की धाराओं की बढ़ोतरी की थी।
अदालत में ‘यू-टर्न’: पुलिस पर लगाए आरोप:
जब मामला ट्रायल के लिए अदालत पहुँचा, तो पीड़िता अपने सभी पुराने बयानों से पूरी तरह मुकर गई।
उसने अदालत में गवाही देते हुए कहा कि:
* वह आरोपी करन को पहचानती तक नहीं है।
* उसका न तो अपहरण हुआ और न ही उसके साथ कोई गलत काम हुआ।
* वह परिजनों से नाराज होकर अपनी मौसी के घर चली गई थी।
* मजिस्ट्रेट और पुलिस के सामने उसने जो बयान दिए थे, वे पुलिस के दबाव और धमकाने के कारण दिए थे।
न्यायालय का कड़ा रुख:
आरोपी के अधिवक्ता नरेंद्र प्रताप सिंह के तर्कों और पीड़िता के मुकरने के बाद साक्ष्यों की कमी को देखते हुए अदालत ने करन को ससम्मान बरी कर दिया।
हालांकि, न्यायालय ने पीड़िता द्वारा न्याय प्रणाली का समय नष्ट करने और झूठी गवाही देने (Perjury) को गंभीरता से लेते हुए उसके विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
गौर तलब है कि कानून के समक्ष झूठा बयान देना भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध है।
इस मामले में कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
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