आगरा ।
यह कहानी है आगरा की गलियों से निकलकर उत्तर प्रदेश की विधिक राजनीति के शिखर तक पहुँचने वाले एक ऐसे व्यक्तित्व की, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वकालत और अधिवक्ताओं के हित में समर्पित कर दिया।
आरंभिक जीवन और नींव:
प्रवीण कुमार सिंह जी का जन्म 25 जुलाई 1952 को ताजनगरी आगरा में हुआ था। उन्हें वकालत के संस्कार विरासत में मिले थे; उनके पिता स्व. राजेन्द्र कुमार सिंह जी आगरा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे थे।
घर में कानून की बारीकियों और सामाजिक सरोकारों का जो माहौल उन्हें मिला, उसने उनके भविष्य की दिशा तय कर दी। उनके बड़े भाई श्री सुबोध कुमार सिंह भी आगरा में ही वकालत कर रहे हैं।
छात्र राजनीति से विधिक नेतृत्व तक:
प्रवीण जी का नेतृत्व कौशल ‘आगरा कॉलेज’ के दिनों में ही निखरने लगा था। 1972 में वे आगरा कॉलेज के छात्र संघ के सचिव चुने गए। छात्र राजनीति की इसी पाठशाला ने उन्हें संघर्ष करना सिखाया।
उनका असली सफर 1987 में शुरू हुआ, जब वे पहली बार बार काउंसिल उत्तर प्रदेश (इलाहाबाद) के सदस्य चुने गए। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वह लगातार 1987, 1993, 1998, 2005 और 2011 के चुनावों में बार काउंसिल के सदस्य के रूप में निर्वाचित होकर अधिवक्ताओं का विश्वास जीतते रहे।
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सफलता के शिखर और ऐतिहासिक कार्य:
* अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी: वर्ष 2005 उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था जब वे बार काउंसिल उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष चुने गए।
* अधिवक्ता कल्याण: उनके प्रयासों से आगरा में दो बार ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता सम्मेलन’ का सफल आयोजन हुआ।
* ऐतिहासिक उपलब्धि: वर्ष 2003 में सूरसदन में आयोजित ‘ऑल इंडिया लॉयर्स कॉन्फ्रेंस’ के दौरान उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. मुलायम सिंह जी से अधिवक्ताओं की वेलफेयर स्कीम के लिए अधिकतम आर्थिक सहायता जारी करवाई, जिससे पूरे प्रदेश में अधिवक्ताओं के लिए भवनों का निर्माण संभव हुआ।
त्याग और संघर्ष:
एक सच्चा नेता वही है जो संस्था के हित के लिए स्वयं का बलिदान दे सके। 2018 में जब बार काउंसिल भंग हुई, तो उन्हें समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
उन्होंने निष्पक्षता दिखाते हुए मात्र 6 महीने के भीतर चुनाव संपन्न कराए। इस व्यस्तता के कारण वे खुद के चुनाव की तैयारी नहीं कर सके और हार गए, लेकिन उन्होंने संस्था की गरिमा को सर्वोपरि रखा।
जीवन की कठिन लड़ाई:
पूरे भारत के अधिवक्ताओं के हक के लिए प्रयासरत रहते हुए वे मधुमेह (शुगर) की बीमारी की चपेट में आए।
लेकिन जिस जीवटता के साथ उन्होंने कोर्ट और राजनीति के मैदान में लड़ाइयां लड़ीं, उसी हिम्मत के साथ उन्होंने अपनी बीमारी से भी मुकाबला किया।
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