पुलिस अभिरक्षा में मारपीट के आरोप पर पुलिस आयुक्त को पुन: जांच एवं कार्यवाही के आदेश

न्यायालय मुख्य सुर्खियां

आगरा ।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट माननीय शारिब अली ने धोखाधड़ी एवं अन्य धाराओं के एक मामले में आरोपी यश खिरवार की गिरफ्तारी के दौरान उसके शरीर पर पाई गईं चोटों के प्रकरण को गंभीरता से लिया है।

न्यायालय ने पुलिस आयुक्त को निर्देश दिए हैं कि वे पूरे मामले के अभिलेखों और आरोपी की आपत्ति का पुन: परीक्षण कर दोषी अधिकारियों अथवा कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार विभागीय कार्यवाही सुनिश्चित करें।

मामले के विवरण के अनुसार, थाना सिकंदरा पुलिस ने धोखाधड़ी के आरोप में यश खिरवार को गिरफ्तार कर आठ फरवरी दो हजार छब्बीस को न्यायिक अभिरक्षा रिमांड के लिए अदालत में पेश किया था।

इस दौरान आरोपी के शरीर पर कई चोटें पाई गईं, जबकि पुलिस द्वारा तैयार किए गए गिरफ्तारी मीमो में किसी भी चोट का कोई उल्लेख नहीं था।

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आरोपी यश खिरवार का आरोप था कि पुलिस ने उसे छह फरवरी दो हजार छब्बीस को ही अवैध रूप से गिरफ्तार कर लिया था और पुलिस अभिरक्षा के दौरान उसके साथ मारपीट कर अमानवीय यातनाएं दी गईं।

आरोपी के शरीर पर गंभीर चोटें देखकर उसके अधिवक्ता प्रवेश सोलंकी एवं शुभम गुप्ता ने न्यायालय से इस पर कानूनी कार्यवाही करने का आग्रह किया था।

इस पर संज्ञान लेते हुए अदालत ने पूर्व में बारह फरवरी दो हजार छब्बीस को आदेश पारित कर पुलिस उपायुक्त नगर से मामले की जांच कराकर आख्या तलब की थी।

पुलिस उपायुक्त नगर द्वारा न्यायालय में प्रेषित की गई जांच आख्या में पुलिस अधिकारियों व कर्मियों के बयान, जीडी एंट्री और मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया था कि आरोपी के साथ पुलिस अभिरक्षा में मारपीट या दुर्व्यवहार का कोई पुष्ट साक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ है।

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न्यायालय के समक्ष आरोपी और उसके अधिवक्ताओं ने पुलिस की इस जांच आख्या को अपूर्ण, पक्षपातपूर्ण एवं विरोधाभासी बताते हुए इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी और एक स्वतंत्र विधिक कार्यवाही की मांग की थी।

दोनों पक्षों को सुनने और मामले के दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद, सीजेएम माननीय शारिब अली ने पुलिस आयुक्त को आदेशित किया कि वह इस प्रकरण से संबंधित समस्त अभिलेखों, साक्ष्यों और आरोपी की आपत्ति का गहराई से पुन: परीक्षण करें।

यदि परीक्षण में किसी भी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी की ओर से कोई अनियमितता, कदाचार, विधि विरुद्ध कार्य अथवा दंडनीय कृत्य प्रथम दृष्टया उजागर होता है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार सख्त विभागीय कार्यवाही की जाए।

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विवेक कुमार जैन
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