नोएडा मजदूर आंदोलन मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डीयू छात्रा की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सरकार से मांगा जवाब

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आगरा/प्रयागराज।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा के चर्चित मजदूर आंदोलन और हिंसा के मामले में जेल में बंद दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हबियस कॉर्पस) रिट याचिका पर सुनवाई की है। अदालत ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

अदालत के निर्देश और अगली सुनवाई:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले में पक्षकार बनाए गए केंद्र सरकार, राज्य सरकार, नोएडा के जिलाधिकारी (डीएम), नोएडा के पुलिस कमिश्नर और जिला जेल के अधीक्षक से तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।

इसके साथ ही, याची आकृति चौधरी को अपना रिजाइंडर (प्रत्युत्तर) दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया गया है।

मामले की अगली सुनवाई 1 सितंबर को निर्धारित की गई है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने की।

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क्या है पूरा मामला और आरोप ?

अपनी गिरफ्तारी और हिरासत को गैरकानूनी बताते हुए आकृति ने जेल से रिहाई के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पुलिस ने उन्हें नोएडा के फेज-2 औद्योगिक क्षेत्र में 13 अप्रैल को हुए मजदूर आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा से कथित तौर पर दो दिन पहले ही हिरासत में ले लिया था।

डीयू की छात्रा पर मजदूरों को उकसाने, हिंसा भड़काने, सोशल मीडिया के जरिये माहौल बिगाड़ने और विदेशी फंडिंग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन्हीं आरोपों के आधार पर प्रशासन ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत कार्रवाई की है।

सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली थी राहत:

इससे पहले मई महीने में आकृति चौधरी ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें सीधा राहत देने से इनकार कर दिया था और उचित मंच के तौर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया था।

पत्रकार सत्यम वर्मा ने भी दी चुनौती:

इस हिंसा मामले में आकृति के साथ-साथ लखनऊ के पत्रकार सत्यम वर्मा को भी आरोपी बनाया गया है और उन पर भी एनएसए लगाया गया है।

सत्यम वर्मा ने भी अपनी गिरफ्तारी और हिरासत को अवैध बताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर पुलिस की इस कार्रवाई को चुनौती दी है।

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मनीष वर्मा
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