आगरा:
मेवाड़ के प्रतापी शासक राणा सांगा पर दिए गए कथित विवादित बयान के मामले में कानूनी प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है।
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (न्यायालय संख्या-19)/एमपी-एमएलए कोर्ट के न्यायाधीश माननीय लोकेश कुमार के समक्ष चल रही सिविल रिवीजन (संख्या-119/2025) में दोनों पक्षों की अंतिम बहस पूरी हो गई है। न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निर्णय के लिए 25 मार्च की तिथि सुरक्षित रखी है।
यह मामला वादी अजय प्रताप सिंह आदि बनाम अखिलेश यादव आदि के रूप में विचाराधीन है। सुनवाई के दौरान विपक्षी संख्या-1 अखिलेश यादव की ओर से अधिवक्ता खुर्शीद अली ने अपनी दलीलें पेश कीं।
वहीं, विपक्षी संख्या-2 सांसद रामजीलाल सुमन की ओर से अधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद और मोहम्मद शब्बीर ने पक्ष रखा। वादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने प्रभावी पैरवी की।
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प्रतिवादी (सांसद रामजीलाल सुमन) के अधिवक्ताओं ने न्यायालय में मुख्य तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत विशेष संसदीय विशेषाधिकार और सुरक्षा प्राप्त है।
उनके अनुसार, एक सांसद के रूप में दिए गए वक्तव्यों पर इस प्रकार की कानूनी कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। साथ ही, उन्होंने दलील दी कि इस वाद में भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय एक अनिवार्य पक्षकार है, जिसके बिना अनुतोष (Relief) नहीं दिया जा सकता।
इसके जवाब में वादी अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने न्यायालय को स्पष्ट किया कि संस्कृति मंत्रालय को विपक्षी बनाने हेतु धारा 80(2) सीपीसी के तहत प्रार्थना पत्र पहले से ही लंबित है और उसका निस्तारण होना शेष है।
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उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यह वाद प्रतिवादियों की व्यक्तिगत क्षमता में दायर किया गया है, इसलिए अनुच्छेद 105 का संरक्षण इस मामले में प्रभावी नहीं होना चाहिए।
सभी पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद, एडीजे 19 माननीय न्यायाधीश लोकेश कुमार ने पत्रावली का अवलोकन कर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है।
अब 25 मार्च को आने वाला यह निर्णय तय करेगा कि इस मामले में सांसदों को प्राप्त विशेषाधिकार और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के बीच कानूनी संतुलन किस प्रकार कायम होता है।
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