सड़क हादसों में घायलों के इलाज की देश व्यापी योजना एक सप्ताह में होगी लागू
सड़क दुर्घटना पीड़ितों को अन्तरिम राहत हेतु केंद्र सरकार को चार महीने में योजना बनाने का दिया निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य वाहन बीमा पर बड़ा कदम उठाते हुए याचिका को सड़क सुरक्षा समिति को भेजा, देश में बीमा व्यवस्था में बड़े सुधार की उम्मीद
आगरा/नई दिल्ली २८ अप्रैल ।
भारत में प्रतिवर्ष लगभग 4,50,000 लोग सड़क हादसों में घायल हो जाते हैं और जिनमें बड़ी संख्या में गोल्डन आवर्स में इलाज न पाये जाने के कारण मृत्यु हो जाती है यद्यपि मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 162(2) में यह प्राविधान है कि केन्द्र सरकार घायलों के इलाज के लिये योजना बनायेगी।
इसको लेकर आगरा के वरिष्ठ अधिवक्ता के0सी0 जैन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका सं0 202442 वर्ष 2023 दायर की थी।
जिस पर सुनवाई उपरान्त 8 जनवरी 2025 को केन्द्र सरकार द्वारा 14 मार्च 2025 तक योजना बनाने के आदेश दिये गये थे। जब यह योजना नियत दिनांक तक नहीं बन सकी तो सड़क एवं परिवहन मंत्रालय के सचिव को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश दिनांक 09 अप्रैल के द्वारा आज दिनांक 28.04.2025 को तलब कर लिया।
सचिव आज वर्चुअल माध्यम से उपस्थित हुए और सुप्रीम कोर्ट में अपनी मजबूरी को बताया कि जनरल इन्श्योरेन्स काउंसिल की रूकावट के कारण यह योजना लागू नहीं की जा सकी है। न्यायालय ने अपना सख्त रूख दिखाते हुए कहा कि धारा 162(2) के प्राविधान सरकार के ही हैं और उनको लागू हुए तीन वर्ष व्यतीत होने के उपरान्त भी अभी तक योजना क्यों नहीं बन सकी है ? न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुए केन्द्रीय सचिव ने कहा कि आज की दिनांक से एक सप्ताह के अन्दर यह योजना देश व्यापी रूप से लागू कर दी जायेगी।
जनरल इन्श्योरेन्स काउंसिल ने भी अपनी याचिका को वापिस ले लिया एवं न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि केन्द्र सरकार द्वारा अधिसूचित योजना को दिनांक 09.05.2025 तक न्यायालय में प्रस्तुत किया जाये जिसके अनुपालन को लेकर न्यायालय में 13.05.2025 को सुनवाई की जायेगी। न्यायालय ने आदेश में यह भी लिखा कि केन्द्र सरकार योजना को समय पर लागू न करने के लिए क्षमा मांगती है। योजना लागू होने पर सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़े राहत के रूप में होगी।
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मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अभय एस ओका एवं न्यायमूर्ति उज्जवल भुआन की पीठ द्वारा की गयी जिसमें अधिवक्ता के0सी0 जैन ने स्वयं अपने पक्ष को प्रस्तुत किया। न्यायमित्र गौरव अग्रवाल एवं केन्द्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बैनर्जी उपस्थित थे।
सोमवार को तीन याचिकाओं की सुनवाई हुई और यह तीनों याचिकाऐं अधिवक्ता जैन द्वारा स्वयं प्रस्तुत की गयीं थीं।
सड़क पीड़ितों को अन्तरिम राहत दिये जाने के लियेः
याची अधिवक्ता के0सी0 जैन की एक अन्य महत्वपूर्ण याचिका सं0 76249 वर्ष 2024 पर भी सुनवाई हुई जो कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164ए के अन्तर्गत सड़क दुर्घटना के पीड़ितों के लिए मुआवजा भुगतान की अन्तरिम राहत के लिये योजना बनाने के लिए थी।
सुनवाई उपरान्त सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164ए के तहत सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए 4 महीने के भीतर राहत योजना बनाए। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह धारा 01 अप्रैल 2022 से लागू है, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने अब तक कोई योजना नहीं बनाई।
इतना महत्वपूर्ण प्रावधान बिना क्रियान्वयन के पड़ा रहना गंभीर चिंता का विषय है।
याचिका के मुख्य बिंदु:
देश में सड़क दुर्घटनाओं के बाद पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय और मुआवजे के लिए वर्षों तक भटकना पड़ता है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तो एक मामला निपटने में 16 साल तक लग सकते हैं। आरटीआई से खुलासा हुआ कि आज तक सरकार ने धारा 164ए के तहत कोई राहत योजना नहीं बनाई है, जिससे हजारों पीड़ित परिवारों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
याचिका में उठाई गई मांग
दुर्घटना में मृत्यु पर तुरंत 5 लाख रुपये और गंभीर चोट पर 2.5 लाख रुपये की तात्कालिक राहत दी जाए।
हर साल मोटर दुर्घटना मामलों का विस्तृत डेटा प्रकाशित किया जाए।
दुर्घटना मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए मोटर दुर्घटना न्यायाधिकरणों (एम ए सी टी ) को पर्याप्त स्टाफ और सुविधाएं दी जाएं।
हाईकोर्ट स्तर पर इन मामलों की निगरानी की व्यवस्था हो।
तीसरी याचिका – अनिवार्य बीमा क्षेत्र में हो सुधारः
देश में सड़क दुर्घटनाओं और वाहनों के बीमा की बेहद कमी स्थिति को लेकर अधिवक्ता के0सी0 जैन की महत्वपूर्ण याचिका आई0ए0 सं0 278218 वर्ष 2024 की सुनवाई की गयी और याचिका में निहित बिन्दुओं को विवेचना हेतु सुप्रीम कोर्ट रोड सुरक्षा समिति की ओर प्रेषित कर दिया एवं याचिका को लम्बित रखा है।
इस याचिका का उद्देश्य है कि सड़क पर चलने वाले प्रत्येक वाहन का अनिवार्य बीमा हो, वाहन मालिकों के लिए व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा सुनिश्चित हो और यात्रियों के लिए भी बीमा सुरक्षा उपलब्ध हो।
मुख्य समस्याएँ जिन पर ध्यान दिलाया गयाः
देश में 37.77 करोड़ गाड़ियों में से सिर्फ 13.82 प्रतिशत गाड़ियों का बीमा है। शेष 86.18 प्रतिशत वाहन बिना बीमा के सड़क पर दौड़ रहे हैं, जिससे दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवजा मिलना मुश्किल हो जाता है। वाहन मालिकों के लिए जरूरी व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा भी बहुत कम लोगों ने लिया है । मात्र 0.72 प्रतिशत गाड़ियों पर ही है।
यात्रियों के लिए बीमा अभी भी वैकल्पिक है, जिससे दुर्घटना में यात्री भी सुरक्षा से वंचित रह जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट पहले भी इस मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं, लेकिन वास्तविक सुधार अब तक नहीं हो पाया है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांगी गई प्रमुख राहतेंः
सभी वाहनों के लिए कम से कम 10 वर्षों के लिए तीसरे पक्ष का बीमा अनिवार्य किया जाए।
वाहन मालिकों के लिए भी 10 वर्षों का व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा अनिवार्य हो।
वाहन में बैठे सभी यात्रियों के लिए बीमा लेना अनिवार्य किया जाए।
वरिष्ठ अधिववक्ता व याची का कथन
मैंने इन तीनों याचिकाओं को सिर्फ एक अधिवक्ता के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के नाते लड़ रहा हूँ। हर दिन सड़कों पर हजारों जानें चली जाती हैं क्योंकि इलाज समय पर नहीं मिल पाता या फिर दुर्घटना के बाद राहत के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं होती।
यह लड़ाई उन टूटते परिवारों, बिलखते बच्चों और बिखरते सपनों के लिए है जिन्हें एक हादसा हमेशा के लिए बदल देता है।
सुप्रीम कोर्ट के सोमवार के आदेशों से मुझे विश्वास है कि देश में सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव आएगा। जब घायल को गोल्डन आर्वस में इलाज मिलेगा, जब पीड़ित परिवारों को तुरंत सहायता मिलेगी और जब हर वाहन बीमित होगा तभी हम वास्तव में कह सकेंगे कि हमने सड़कों को इंसानों के जीने लायक बनाया है, मरने का इंतजार करने का नहीं।
एक नयी शुरुआत होगी जिससे अनगिनत जिंदगियां बचेंगी और भारत को एक अधिक मानवीय और सुरक्षित देश बनाएगी। मेरा सपना है कि कोई भी पीड़ित इलाज के बिना न तड़पे, कोई भी परिवार न्याय के लिए बरसों न भटके।
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