इलाहाबाद हाईकोर्ट में सरकारी धन से निर्मित चेंबरों के भारी-भरकम शुल्क पर उठा विवाद, अधिवक्ताओं ने लिखा मुख्य न्यायाधीश को पत्र

उच्च न्यायालय मुख्य सुर्खियां

आगरा/प्रयागराज।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता चेंबर आवंटन की प्रक्रिया को लेकर विवाद गहरा गया है। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा भेजी गई सूची और प्रस्तावित आवंटन राशि पर सवाल उठाते हुए पूर्व उपाध्यक्ष हरिवंश सिंह एवं प्रशांत सिंह ‘रिंकू’ सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है।

अधिवक्ताओं ने वर्तमान आवंटन प्रक्रिया को “मनमाना” करार देते हुए वरिष्ठता और योग्यता को आधार बनाने पर जोर दिया है।

वरिष्ठता और पात्रता पर सवाल:

मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि बार एसोसिएशन द्वारा तैयार की गई सूची में कई योग्य अधिवक्ताओं के नाम शामिल नहीं हैं, जबकि कई अपात्रों को जगह दी गई है।

पत्र में तर्क दिया गया कि:

* किसी परिस्थिति वश मतदाता सूची में नाम न होने का अर्थ यह नहीं कि अधिवक्ता चेंबर के लिए अपात्र है।

* केवल मतदाता सूची की वरिष्ठता को ही “वास्तविक वरिष्ठता” मानना अनुचित है।

* चेंबरों की सीमित संख्या को देखते हुए महिलाओं, वरिष्ठ अधिवक्ताओं और उन अधिवक्ताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिन्हें अब तक चेंबर आवंटित नहीं हुए हैं।

शुल्क वृद्धि को बताया ‘अनुचित बोझ’:

अधिवक्ताओं ने प्रस्तावित आवंटन राशि पर कड़ी आपत्ति जताई है। हरवंश सिंह ने बताया कि पिछले चार दशकों के इतिहास में चेंबर आवंटन के लिए ढाई हजार से पांच हजार रुपये तक की राशि ली जाती रही है।

किंतु इस बार:

* ढाई लाख रुपये (चेंबर) और एक लाख रुपये (सीट) तक का प्रस्ताव रखा गया है, जो वकीलों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ है।

* चेंबरों का निर्माण सरकारी पैसे से हुआ है, अतः इनके रखरखाव की जिम्मेदारी अन्य सरकारी भवनों की तरह हाईकोर्ट की होनी चाहिए।

* अधिवक्ताओं ने मांग की है कि पूर्व की भांति सांकेतिक 25 हजार रुपये लेकर वरिष्ठता के आधार पर चेंबर आवंटित किए जाएं।

न्यायमूर्ति काटजू के ऐतिहासिक फैसले का हवाला:

अधिवक्ता ए.एन. शुक्ल, नीरज द्विवेदी और संतोष कुमार मिश्र सहित अन्य वकीलों ने न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू की खंडपीठ के उस ऐतिहासिक फैसले का स्मरण कराया, जिसमें कहा गया था कि ‘बार और बेंच एक ही सिक्के के दो पहलू हैं’।

“अधिवक्ता न्यायपालिका के अभिन्न अंग हैं। यदि उन्हें अध्ययन के लिए चेंबर और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तो वे अदालत का सहयोग नहीं कर पाएंगे, जिससे सीधे तौर पर न्यायिक कार्य प्रभावित होगा।”

प्रमुख मांगें:

* सरकारी बजट से हो देखरेख: चूंकि भवन हाईकोर्ट का है, इसलिए राज्य सरकार के वार्षिक बजट से इसका रखरखाव हो।

* वरीयता निर्धारण: आवंटन में महिला और बुजुर्ग अधिवक्ताओं को प्राथमिकता मिले।

* विधिक प्रक्रिया: आवंटन केवल वास्तविक वरिष्ठता के आधार पर हो, न कि केवल मतदाता सूची के आधार पर।

इस पत्र को भेजने वालों में मुख्य रूप से बी.पी. शुक्ल, बी.डी. पांडेय, एन.के. चटर्जी, अशोक सिंह और मृत्युंजय तिवारी सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता शामिल रहे।

Stay Updated With Latest News Join Our WhatsApp  – Channel BulletinGroup Bulletin

मनीष वर्मा
Follow Me

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *