आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अनाथ बच्ची के भविष्य को देखते हुए अनुकंपा नियुक्ति के मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश मृत सरकारी सेवकों के आश्रितों की भर्ती नियमावली, 1974 के नियम 10 के तहत राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह कठिन और विशेष परिस्थितियों में नियमों को शिथिल कर विशेष आदेश पारित कर सके।
मामले की पृष्ठभूमि: एक मासूम की त्रासदी
यह मामला बलिया निवासी राजकुमारी देवी की विशेष अपील से जुड़ा है।
प्रकरण के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार हैं:
* सहायक शिक्षक शैलेंद्र कुमार भारती की सेवाकाल के दौरान मृत्यु हो गई।
* दुखद रूप से, उनकी मृत्यु के मात्र एक माह बाद उनकी पत्नी का भी देहांत हो गया।
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* उनकी नौ वर्षीय पुत्री सौम्या (शाक्षी) अनाथ हो गई, जिसकी देखरेख उसकी चाची राजकुमारी देवी और चाचा कर रहे हैं।
* कोर्ट ने चाची राजकुमारी देवी को बच्ची का विधिक संरक्षक (Guardian) घोषित किया है।
विवाद: ‘परिवार’ की परिभाषा और तकनीकी अड़चन:
पूर्व में, बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) ने 13 नवंबर 2025 को अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि ‘चाची’ नियमावली के नियम 2 (सी) के तहत ‘परिवार’ की परिभाषा में नहीं आतीं।
एकलपीठ ने भी इस आधार पर याचिका खारिज कर दी थी, जिसके विरुद्ध यह विशेष अपील दाखिल की गई।
खंडपीठ का मानवीय दृष्टिकोण:
न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह तथा न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निम्नलिखित टिप्पणियाँ कीं:
* सरकार की शक्ति: कोर्ट ने कहा कि सरकार के पास नियमों के कार्यान्वयन में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति है।
* दावे की वैधता: प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता के दावे में दम है। यदि परिवार का कोई अन्य सदस्य उपलब्ध नहीं है या अयोग्य है, तो नियमों का लचीला रुख अपनाना चाहिए।
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* विशेष परिस्थिति: चूंकि बच्ची अनाथ है और उसकी चाची ही उसकी देखभाल कर रही हैं, यह एक ‘विशेष परिस्थिति’ है।
“राज्य सरकार नौ वर्षीय सौम्या के मामले में सहानुभूतिपूर्वक विचार करे और एक सप्ताह के भीतर बिना किसी तकनीकी आपत्ति के मेरिट पर आदेश पारित करे।” खंडपीठ
आगे का निर्देश:
अदालत ने सरकार को इस स्थिति पर निर्णय लेने और हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियमों का उद्देश्य आश्रित परिवार को तत्काल सहायता प्रदान करना है, न कि तकनीकी आधार पर उन्हें संकट में छोड़ना।
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