एससी/एसटी कानून के तहत सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता द्वारा शक्ति का दुरुपयोग : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिए जांच के निर्देश

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हाईकोर्ट ने पाया कि प्रथम दृष्टया झूठी एफआईआर दर्ज करा कर 21 लाख रुपए लिए गए

आगरा / प्रयागराज 14 सितंबर ।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को उस मामले की जांच करने का निर्देश दिया है, जिसमें झांसी में सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता के पद का दुरुपयोग अधिकारी द्वारा एससी/एसटी एक्ट 1989 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराने और अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग में किया जा रहा है।

याचिकाकर्ता नंबर एक ललिता यादव झांसी में जिला समाज कल्याण अधिकारी, झांसी के रूप में तैनात है और याचिकाकर्ता नंबर 2 पहले उसी पद पर तैनात था। दोनों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर शिकायतकर्ता के इशारे पर उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता और एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर को चुनौती दी है।

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इन पर आरोप है कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी आधिकारिक क्षमता में अधिनियम के तहत मुआवजे का केवल एक हिस्सा वितरित किया था और बाकी को गैरकानूनी रूप से रोक दिया था।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया कि शिकायतकर्ता ने उक्त कानून के तहत कल्याण योजना से मुआवजा पाने के लिए नियमित रूप से झूठा आपराधिक मुकदमा दायर कर रहा था। यह दलील दी गई कि साक्ष्य के अनुसार शिकायत कर्ता ने लगभग 21 लाख रुपये लिए है।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि विभिन्न व्यक्तियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने के लिए राशि 27 लाख रुपये लिया गया है। यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता भुगतान किए गए मुआवजे के लिए जिम्मेदार नहीं थी।

क्योंकि वह उस समय झांसी में तैनात नहीं थी। इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि भले ही दूसरा याचिकाकर्ता झांसी में तैनात था, लेकिन मुआवजे को देने में “चार सदस्यीय समिति” द्वारा अनुमोदित किया गया था।

जस्टिस विवेक कुमार बिड़ला और जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की खंडपीठ ने कहा कोर्ट की नजर में प्रथम दृष्टया यह एडीजीसी (आपराधिक) के आधिकारिक पद के दुरुपयोग का एक स्पष्ट उदाहरण प्रतीत होता है

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हालांकि, कोई अंतिम निष्कर्ष दर्ज नहीं किया जा रहा है और यह उचित होगा कि पूरे मामले को प्रतिवादी उत्तर प्रदेश राज्य के सचिव, गृह के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से देखा जाए और उनकी ओर से उचित कार्रवाई/निर्देश जारी किया जाए और इस न्यायालय को सूचित किया जाए कि इसमें क्या कार्रवाई की गई है ?

अदालत ने देखा कि प्रतिवादी शिकायत कर्ता ने 2014-2023 के बीच 12 एफआईआर दर्ज की थीं और उन 12 मामलों में से 9 में मुआवजा प्राप्त किया था।

तदनुसार, न्यायालय ने कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट, झांसी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, झांसी को व्यक्तिगत रूप से पूरे रिकॉर्ड को देखने और उचित कदम उठाने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने यह निर्देश दिया है कि उठाए गए कदमों का उल्लेख करते हुए एक उचित हलफनामा अदालत के समक्ष दायर किया जाए।

मामले को हाईकोर्ट ने पुनः सुनवाई के लिए 21 अक्टूबर 2024 को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है।

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मनीष वर्मा
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