आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में ‘न्याय में देरी’ को मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हुए 100 वर्षीय एक व्यक्ति को हत्या के आरोप से बरी कर दिया है।
न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि न्याय मिलने में चार दशक का समय लगना, विशेषकर तब जब अभियुक्त अति-वृद्ध हो, ‘न्याय से इंकार ‘ करने के समान है।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले (थाना मौदहा) का है। 9 अगस्त 1982 को राजा भाई नामक व्यक्ति ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी कि उसके भाई ‘गुनुवा’ की गोली मारकर हत्या कर दी गई है।
आरोप था कि सत्तीदीन (भाला) और धानी राम (फरसा) ने मुख्य आरोपी माइकू को हत्या के लिए उकसाया था। 27 जुलाई 1984 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, हमीरपुर ने सत्तीदीन और धानी राम को दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट का निर्णय और टिप्पणी:
न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह तथा न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए सत्तीदीन को दोषमुक्त करार दिया।

कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं को आधार बनाया:
* न्याय में अत्यधिक विलंब: अभियुक्त घटना के समय 56 वर्ष का था और अब 100 वर्ष का हो चुका है। अपील के निर्णय के इंतजार में उसने 40 साल जमानत पर बिता दिए।
* साक्ष्यों में विरोधाभास: कोर्ट ने पाया कि चश्मदीद गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खा रहे थे और वे अविश्वसनीय थे।
* मेडिकल रिपोर्ट का अभाव: अभियोजन पक्ष का दावा मेडिकल साक्ष्यों से पुष्ट नहीं हो सका।
* प्राथमिकी (FIR) में देरी: घटना और रिपोर्ट दर्ज कराने के बीच के समय का उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी:
“न्याय में देरी न्याय से इंकार है (Justice delayed is justice denied)। अभियुक्त को इस उम्र में सजा भुगतने के लिए छोड़ना न्यायोचित नहीं है, विशेषकर तब जब अभियोजन पक्ष अपना केस संदेह से परे साबित करने में विफल रहा हो।”
निष्कर्ष:
उच्च न्यायालय ने पाया कि सत्र अदालत का 1984 का फैसला त्रुटिपूर्ण था। साक्ष्यों के अभाव और कानूनी खामियों के कारण कोर्ट ने सत्तीदीन की अपील स्वीकार करते हुए उसकी सजा को रद्द कर दिया और उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।
Stay Updated With Latest News Join Our WhatsApp – Channel Bulletin & Group Bulletin
- इलाहाबाद हाईकोर्ट का कड़ा रुख: क्या बिना नोटिस किसी पूजा स्थल को सील कर सकता है प्रशासन ? राज्य सरकार से मांगा जवाब - March 29, 2026
- इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: विवाहित रहते हुए तीसरे व्यक्ति के साथ ‘लिव-इन’ अवैध, सुरक्षा देने से किया इंकार - March 29, 2026
- इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: “पैसों की वसूली के लिए धूमनगंज थाने को बना दिया गया ‘सिविल कोर्ट'” - March 27, 2026







