आगरा।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोगप्रथम, आगरा ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और उसके अधिकारियों को ‘सेवा में कमी’ का दोषी मानते हुए, दो उपभोक्ताओं (परिवादीगण) को ₹24,84,162/- (चौबीस लाख चौरासी हजार एक सौ बासठ रुपये) का भुगतान करने का आदेश दिया है।
यह धनराशि परिवादी रोहित जौहरी और श्रीमती शिखा जौहरी को बैंक द्वारा जारी जाली फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदों (FDRs) के कारण हुए नुकसान की भरपाई के लिए दी गई है।
पृष्ठभूमि: मामला और आरोप
परिवादी रोहित जौहरी और उनकी पत्नी श्रीमती शिखा जौहरी ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, शाखा सिकंदरा, आगरा के विरुद्ध परिवाद संख्या 65/2015 दायर किया था।

* मूल निवेश: परिवादीगण ने जून 2010 में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की सिकंदरा शाखा में तीन फिक्स्ड डिपॉजिट्स (FDRs) के माध्यम से कुल ₹11,00,000/- (ग्यारह लाख रुपये) जमा किए थे।
* 08.06.2010 को दो FDRs, प्रत्येक ₹3,50,000/- के लिए।
* 10.06.2010 को एक FDR, ₹4,00,000/- के लिए।
* परिवाद का आधार: परिवादीगण ने आरोप लगाया कि जब सितंबर 2014 में उन्हें पैसे की आवश्यकता हुई और उन्होंने बैंक से संपर्क किया, तो तत्कालीन शाखा प्रबंधक ने बताया कि FDRs की प्रविष्टि बैंक के अभिलेखों में नहीं है और भुगतान में आनाकानी की।
* बैंक का बचाव: प्रतिपक्षी बैंक (सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया) ने इन FDRs को कूटरचित (जाली) बताते हुए, परिवादीगण को अपना उपभोक्ता मानने से इंकार कर दिया और दावा किया कि जमा धनराशि बैंक के खाते में जमा नहीं हुई थी।
न्यायालय का निष्कर्ष और अवलोकन:
माननीय आयोग, जिसमें अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य अरुण कुमार शामिल थे, ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों और लिखित बहस का गहनता से अवलोकन किया और निम्नलिखित महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए:
* उपभोक्ता-सेवा प्रदाता संबंध स्थापित: आयोग ने पाया कि तत्कालीन हैड कैशियर प्रदीप कुमार सक्सैना (प्रतिपक्षी संख्या 03) ने बैंक के पटल पर कार्य करते हुए ये FDRs जारी किए थे। बैंक के एक पत्र (दिनांक 27.12.2014) से यह सिद्ध हुआ कि श्री सक्सैना ने अपने हस्ताक्षर कर धनराशि बैंक में जमा किए बगैर FDRs जारी किए थे। पुलिस विवेचना के उपरान्त प्रदीप कुमार सक्सैना के विरुद्ध आरोप पत्र भी प्रेषित किया गया, जिसमें तत्कालीन शाखा प्रबंधक वी.के. मिश्रा का नाम भी संदिग्ध अभियुक्त के रूप में अंकित था।
* प्रतिनिधित्व दायित्व (Vicarious Liability): आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि FDRs बैंक द्वारा निर्गत किए गए थे, और यदि तत्कालीन कार्यरत कर्मचारियों ने प्राप्त धनराशि बैंक में जमा नहीं की, तो ऐसी स्थिति में प्रतिनिधित्व दायित्व (Vicarious Liability) के आधार पर प्रतिपक्षी बैंक FDR की जमा धनराशि मय ब्याज भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है। आयोग ने ‘पिशोरा सिंह बनाम बैंक ऑफ पंजाब’ (AIR 2017 SC 2696) सहित कई निर्णयों का हवाला दिया।
* सेवा में कमीं: इन निष्कर्षों के आधार पर, आयोग ने माना कि परिवादी द्वारा दाखिल की गई FDRs का भुगतान न करके, प्रतिपक्षीगण द्वारा सेवा में कमीं कारित की गई है।
निर्णय और आदेश:
परिवाद संख्या 65/2015 पर दिनांक 08.12.2022 को अंतिम निर्णय सुनाया गया।
* क्षतिपूर्ति और ब्याज: प्रतिपक्षीगण को संयुक्तता एवं पृथक्कता रूप से कुल ₹11,00,000/- (ग्यारह लाख रुपये) मूल जमा धनराशि का भुगतान दिनांक 10.06.2010 से वास्तविक भुगतान की तिथि तक 06 प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्याज की दर से करने का आदेश दिया गया।
* दंडात्मक ब्याज: यदि प्रतिपक्षीगण 45 दिन के भीतर भुगतान नहीं करते हैं, तो ब्याज की दर 06 प्रतिशत के स्थान पर 08 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज होगी।
* मानसिक पीड़ा और वाद व्यय: इसके अतिरिक्त, प्रतिपक्षीगण को मानसिक पीड़ा के मद में ₹50,000/- और वाद व्यय के लिए ₹5,000/- का भुगतान भी सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया।
निष्पादन वाद और अंतिम भुगतान:
* निष्पादन वाद: चूंकि बैंक द्वारा निर्णय का पालन नहीं किया गया था, परिवादीगण ने निष्पादन वाद संख्या 40/2025 दायर किया।
* बैंक द्वारा भुगतान: पत्रावली के अवलोकन से यह स्पष्ट हुआ कि प्रतिपक्षी बैंक द्वारा परिवाद संख्या 65/2015 के निर्णय दिनांकित 08.12.2022 के अनुपालन में, आयोग में दिनांक 15.10.2025 को ₹24,84,162/- का डिमांड ड्राफ्ट (DD) जमा किया जा चुका है।
* अंतिम आदेश (03.11.2025): आयोग ने दिनांक 03.11.2025 को आदेश दिया कि आयोग के खाते में जमा धनराशि ₹24,84,162/- का एकाउन्टपेयी चैक (Account Payee Cheque) डिकीदार/परिवादी के पक्ष में निर्गत किया जाए। इसके साथ ही, निष्पादन वाद की कार्यवाही समाप्त कर दी गई और सत्रह नवंबर को आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार ने ₹24,84,162/- धनराशि का चेक रोहित जोशी को प्रदान किया । इस अवसर पर सदस्य राजीव सिंह और वादी के अधिवक्ता नरेश शर्मा और अमन चौधरी भी उपस्थित थे ।
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