आगरा/प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने प्रशासनिक कामकाज और फुल कोर्ट बैठकों की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने चार मामलों से जुड़े करीब 80 पन्नों के विस्तृत फैसले में हाईकोर्ट की फुल कोर्ट बैठकों की चर्चा, जजों की व्यक्तिगत राय को रिकॉर्ड पर न लाने और मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित प्रशासनिक व्यवस्था पर अहम टिप्पणियां की हैं।
कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि फुल कोर्ट की कार्यवाही में अलग-अलग न्यायाधीशों की सहमति या असहमति दर्ज नहीं की जाती है।
फैसले में कहा गया कि यदि व्यक्तिगत जजों की राय रिकॉर्ड में नहीं आती, तो इससे यह सवाल उठता है कि क्या फुल कोर्ट वास्तव में न्यायाधीशों के बीच सामूहिक और सार्थक विचार-विमर्श का मंच बन पा रहा है या नहीं।
न्यायमूर्ति दिवाकर ने स्पष्ट किया कि फुल कोर्ट का उद्देश्य केवल किसी प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लगाना नहीं है, बल्कि सभी जजों के विचारों को महत्व देना है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स, 1952 के चैप्टर-3 के नियम 8 का हवाला देते हुए फैसले में बताया गया कि मुख्य न्यायाधीश को सामान्य तौर पर हर तीन महीने में फुल कोर्ट की बैठक बुलानी चाहिए।
इसके अलावा, यदि कम से कम पांच न्यायाधीश बैठक का अनुरोध करते हैं, तो एक सप्ताह के भीतर इसे बुलाए जाने का प्रावधान है।
Also Read – इलाहाबाद हाईकोर्ट का शिक्षा मित्रों को झटका: स्पेशल टीईटी 2026 में शामिल करने की मांग वाली याचिका खारिज

इसके बावजूद, पिछले 10 वर्षों में केवल 16 फुल कोर्ट बैठकें ही आयोजित की गईं। पिछली 10 बैठकों के एजेंडे की समीक्षा करने पर कोर्ट ने पाया कि इनमें से ज्यादातर प्रस्ताव सीनियर एडवोकेट के पदनाम या न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों से ही जुड़े थे।
हालिया बैठकों की प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि हाल की दो फुल कोर्ट बैठकों से ऐसा आभास हुआ मानो वे किसी सरकारी विश्वास मत की तरह पहले से तय प्रक्रिया के तहत संचालित हुई हों।
न्यायालय ने संस्थागत अनुशासन, निष्पक्ष प्रक्रिया और न्यायिक गरिमा बनाए रखने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया।
अदालत ने हाईकोर्ट के प्रशासन में मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित मॉडल को फिर से संतुलित करने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि न्यायाधीशों के बीच प्रशासनिक और न्यायिक मामलों पर अधिक सहभागी और संस्थागत संवाद होना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, न्यायिक कार्य के आवंटन, पदोन्नति और उच्च पदों पर नियुक्ति जैसे मामलों में स्पष्ट व अधिसूचित मानकों की कमी पर भी सवाल उठाए गए।
फैसले के अंत में चेतावनी देते हुए कोर्ट ने कहा कि संस्थागत जवाबदेही के लिए स्पष्ट प्रशासनिक मानक और नियम आधारित प्रभावी समीक्षा तंत्र जरूरी हैं।
यदि इन मुद्दों को उचित प्रक्रिया और संयम के साथ नहीं सुलझाया गया, तो इसका सीधा असर संस्थागत अनुशासन और कानून के शासन पर पड़ सकता है।
Stay Updated With Latest News Join Our WhatsApp – Channel Bulletin & Group Bulletin
- यूपी पुलिस सब इंस्पेक्टर भर्ती 2025: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नियुक्ति पत्र जारी करने पर लगाई रोक - October 2, 2026
- बालिग को जीवनसाथी चुनने और अपनी पसंद से रहने का मौलिक अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट - October 2, 2026
- इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन पर एकल पीठ की टिप्पणी: 10 वर्षों में सिर्फ 16 फुल कोर्ट बैठकें, जजों की राय दर्ज न होने पर जताई चिंता - October 2, 2026





1 thought on “इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन पर एकल पीठ की टिप्पणी: 10 वर्षों में सिर्फ 16 फुल कोर्ट बैठकें, जजों की राय दर्ज न होने पर जताई चिंता”