न्यायमूर्ति ने कहा कि गिरफ्तारी-पूर्व, गिरफ्तारी और रिमांड चरण में कानूनी सहायता को मजबूत करना यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्तियों को औपचारिक हिरासत से पहले समय पर सहायता मिले
आगरा /नई दिल्ली 19 नवंबर ।
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस बी.आर. गवई ने कहा कि हाशिए पर पड़े नागरिकों को सशक्त बनाना केवल कानूनी या आर्थिक सहायता का मामला नहीं है, बल्कि उन्हें खुद की वकालत करने के लिए भी सक्षम होना चाहिए।
हाल ही में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए गए जस्टिस बी.आर. गवई को पंजाब, हरियाणा और यू.टी. चंडीगढ़ के राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों द्वारा आयोजित “हाशिए पर पड़े लोगों को सशक्त बनाने के लिए प्राधिकरण और सामाजिक न्याय की दिशा में एक कदम: उपलब्धियां और रोडमैप “ नामक सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में विचार व्यक्त कर रहे थे।
जस्टिस गवई ने कैदियों के अधिकारों की रक्षा और उनके बच्चों और परिवार की देखभाल में विधिक सेवा प्राधिकरणों की भूमिका पर बात की।
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न्यायमूर्ति गवई ने कहा,
“उनकी दुर्दशा इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि 76 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं, यानी उन्हें अभी तक दोषी नहीं पाया गया। उनमें से कई कानूनी सहायता उन तक नहीं पहुँचने के कारण जेलों में सड़ रहे होंगे।”
जस्टिस गवई ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैदियों को उनके अधिकारों तक पहुंचने में एक बड़ी बाधा कानूनी सुरक्षा और उपलब्ध सेवाओं के बारे में उनकी जागरूकता की कमी है। इन बाधायों को दूर करने के लिए जेलों के भीतर कानूनी जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
जस्टिस गवई ने कहा कि गिरफ्तारी से पहले, गिरफ्तारी और रिमांड चरण में कानूनी सहायता प्रदान करने में गंभीर रूप से कमी है ।इस संबंध में उपलब्ध
आंकड़ों का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति ने कहा,
“जनवरी, 2024 से अगस्त, 2024 तक पूरे भारत में 24,173 व्यक्तियों को पुलिस थानों में गिरफ्तारी-पूर्व चरण में कानूनी सहायता दी गई। 23,079 व्यक्तियों को गिरफ्तारी चरण में कानूनी सहायता दी गई और 2,25,134 व्यक्तियों को रिमांड चरण में कानूनी सहायता दी गई।”न्यायमूर्ति ने कहा कि गिरफ्तारी-पूर्व, गिरफ्तारी और रिमांड चरण में कानूनी सहायता को मजबूत करना यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्तियों को औपचारिक हिरासत से पहले समय पर सहायता मिले।”
जस्टिस बीआर गवई ने कैदियों के परिवारों का समर्थन करने में कानूनी सेवा प्राधिकरणों की भूमिका की ओर भी इशारा किया।
उन्होंने कहा,
“इसमें माता-पिता की कैद से प्रभावित बच्चों के लिए परामर्श, वित्तीय सहायता और शैक्षिक संसाधन प्रदान करने के लिए सामाजिक कल्याण विभागों, गैर सरकारी संगठनों, बाल कल्याण समितियों और अन्य सहायता नेटवर्क के साथ सहयोग करना शामिल है। इसके अतिरिक्त, कानूनी सेवा प्राधिकरण परिवार के दौरे और संचार के अवसरों की सुविधा प्रदान कर सकते हैं, यह मानते हुए कि इन संबंधों को बनाए रखना कैदियों और उनके परिवारों दोनों की मानसिक भलाई के लिए आवश्यक हो सकता है।”
जस्टिस गवई ने सुहास चकमा बनाम भारत संघ मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने जागरूकता के पहलू पर कई निर्देश पारित किए।

इस कार्यक्रम में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस एजी मसीह सहित सुप्रीम कोर्ट के जज भी शामिल हुए।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख के चीफ जस्टिस ताशी रबस्तान और हिमाचल प्रदेश के एक्टिंग चीफ जस्टिस ने भी सम्मेलन को संबोधित किया। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने जजों के साथ-साथ रजिस्ट्रार (सतर्कता) कमलजीत लांबा भी मौजूद थे।
तकनीकी प्रगति के अनुरूप सम्मेलन के दौरान ‘क्यूआर कोड के माध्यम से लागत जमा करने की सुविधा’ और ‘खातों के लिए ऑनलाइन पोर्टल’ का अनावरण किया गया।
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साभार: लाइव लॉ
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