आगरा।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) माननीय शारिब अली आगरा की अदालत ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बिजली कनेक्शन प्राप्त करने, धोखाधड़ी और संपत्ति पर अवैध कब्जा करने के प्रयास के एक गंभीर मामले में थाना न्यू आगरा पुलिस को मुकदमा दर्ज कर विवेचना करने के आदेश दिए हैं।
यह आदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 173(4) के तहत दिया गया है।
मामला परिवादी दिनेश कालरा द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत प्रार्थना पत्र से संबंधित है। परिवादी का आरोप है कि विपक्षी नवीन पालीवाल ने उनकी संपत्ति के एक हिस्से पर अवैध कब्जा करने की नीयत से 15 अप्रैल 2014 को एक फर्जी और कूटरचित अनुबंध पत्र तैयार किया।
इस अनुबंध पर परिवादी के फर्जी हस्ताक्षर किए गए और उनके परिवार के सदस्यों के फोटो का दुरुपयोग किया गया। इन्हीं फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करते हुए विपक्षी ने टोरेंट पावर से विद्युत कनेक्शन के लिए आवेदन किया।
वाद पत्र के अनुसार, परिवादी दिनेश कालरा ने 7 अप्रैल 2015 को टोरेंट पावर के अधिकारियों को लिखित रूप से अवगत करा दिया था कि नवीन पालीवाल की किरायेदारी समाप्त हो चुकी है और वह फर्जी कागजातों के आधार पर कनेक्शन लेने का प्रयास कर रहा है।

आरोप है कि टोरेंट पावर के अधिकारियों (महाप्रबंधक और सहायक महाप्रबंधक) ने इस चेतावनी और लिखित विरोध को पूरी तरह अनदेखा किया। मिलीभगत और आपराधिक लापरवाही बरतते हुए फर्जी कागजों पर बिजली कनेक्शन जारी कर दिया गया।
वर्तमान में उस कनेक्शन के भारी बकाये बिलों की मांग परिवादी दिनेश कालरा से की जा रही है, जिससे उन्हें आर्थिक और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।
शिकायत में यह भी बताया गया कि विपक्षी द्वारा अन्य सरकारी विभागों में भी फर्जी दस्तावेज लगाए गए थे, जिसकी पुष्टि जिला निर्वाचन अधिकारी की एक रिपोर्ट से भी हुई है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय के संज्ञान में आया कि थाना न्यू आगरा पुलिस ने अपनी शुरुआती जांच आख्या में कहा था कि परिवादी द्वारा मूल दस्तावेज और हस्ताक्षरों की फोरेंसिक रिपोर्ट उपलब्ध न कराने के कारण आरोपों की पुष्टि नहीं होती है।
हालांकि, सीजेएम आगरा माननीय शारिब अली ने पुलिस की इस आख्या पर असहमति जताते हुए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया कूटरचना और जालसाजी के गंभीर आरोपों को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि प्रारंभिक जांच के समय मूल दस्तावेज या फोरेंसिक रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई।
न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां दस्तावेजों की वास्तविकता, हस्ताक्षरों की सत्यता और प्रामाणिकता की जांच आवश्यक हो, वहां पुलिस विवेचना के माध्यम से ही उचित परीक्षण किया जाना न्यायोचित है।
सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने दिनेश कालरा के प्रार्थना पत्र को स्वीकार कर लिया है। न्यायालय ने थानाध्यक्ष, थाना न्यू आगरा को निर्देशित किया है कि वह प्रार्थना पत्र में वर्णित तथ्यों के आधार पर सुसंगत धाराओं में प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) पंजीकृत करें।
इसके उपरांत कथित कूटरचित दस्तावेजों, हस्ताक्षरों और विद्युत कनेक्शन संबंधी अभिलेखों का बारीकी से परीक्षण करते हुए मामले की निष्पक्ष और विधिसम्मत विवेचना कर आवश्यक कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करें।
परिवादी की तरफ़ से प्रभावी पैरवी एडवोकेट बलवीर सिंह, एडवोकेट विवेक कुमार जैन और एडवोकेट नरेश कुमार द्वारा की गई ।
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