दिल्ली कोर्ट ने बेटे को घर से बेदखल करने पर लगाई रोक,संपत्ति में ‘तीसरे पक्ष का हित’ बनाने पर भी पाबंदी

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आगरा/नई दिल्ली:

साकेत कोर्ट के सिविल जज (ACJ-cum-CCJ-cum-ARC) माननीय तरुणप्रीत कौर ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए पिता और भाई को निर्देश दिया है कि वे मुकदमे के लंबित रहने तक वादी (बेटे और बेटी) को संपत्ति से जबरन बेदखल न करें और न ही संपत्ति में कोई तीसरा पक्ष (Third-party interest) बनाने का प्रयास करें।

मामले की पृष्ठभूमि:

यह विवाद मदनपुर खादर, सरिता विहार स्थित दो संपत्तियों (संपत्ति संख्या 159 B और 62, भांगर मोहल्ला) से जुड़ा है। वादी उमंग सोनी का दावा है कि वह वर्ष 2017 से इन संपत्तियों की पहली और दूसरी मंजिल पर अपनी पत्नी के साथ रह रहा है।

वादी के मुख्य तर्क:

* वसीयत द्वारा मालिकाना हक: वादी ने दावा किया कि उसके चाचा स्वर्गीय श्री महिंदर सिंह ने वर्ष 2003 की एक वसीयत के माध्यम से पहली मंजिल का हिस्सा उसके नाम कर दिया था, जिससे वह उस हिस्से का पूर्ण स्वामी बन गया।

* निर्माण में वित्तीय योगदान: वादी के अनुसार, उसने अपने पिता (प्रतिवादी संख्या 1) की दूसरी संपत्ति खरीदने में मदद की और दोनों संपत्तियों को जोड़कर नए सिरे से निर्माण कराने के लिए ₹30 लाख का योगदान दिया, जबकि पिता ने केवल ₹10 लाख खर्च किए थे।

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* बेदखली का डर: वादी ने आरोप लगाया कि जून 2025 में उसके पिता और भाई ने उसे और उसकी पत्नी को जबरन घर से निकालने की कोशिश की और अब वे इस संपत्ति को बेचने के लिए डीलरों से मिल रहे हैं।

प्रतिवादियों का पक्ष:

पिता (लखपत सिंह) और उनके दूसरे बेटे ने इन दावों का पुरजोर विरोध किया।

उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:

* कानूनी रोक: प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि यह मुकदमा ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम’ (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act) की धारा 27 के तहत वर्जित है।

* संपत्ति का स्वरूप: उन्होंने दावा किया कि यह संपत्ति पिता की स्व-अर्जित (Self-acquired) संपत्ति है और वादी वहां केवल ‘परमिट’ (Permissive use) के आधार पर रह रहा है।

* उत्तराधिकार से वंचित: पिता ने कोर्ट को बताया कि वादी के दुर्व्यवहार के कारण उन्होंने अगस्त 2025 में अखबार में नोटिस देकर उसे अपनी संपत्ति से बेदखल (Disown) कर दिया था।

कोर्ट का निर्णय और विश्लेषण:

अदालत ने अंतरिम निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) के लिए आवश्यक तीन प्रमुख कानूनी सिद्धांतों पर विचार किया: प्रथम दृष्टया मामला (Prima facie case), सुविधा का संतुलन (Balance of convenience), और अपूरणीय क्षति (Irreparable loss)।

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कोर्ट की टिप्पणियाँ:

* कब्जे की स्वीकृति: अदालत ने नोट किया कि प्रतिवादियों ने इस तथ्य से इंकार नहीं किया है कि वादी और उसकी पत्नी वर्तमान में संपत्ति में रह रहे हैं।

* प्रथम दृष्टया मामला: वादी द्वारा वसीयत और निर्माण में योगदान के दावों को देखते हुए, कोर्ट ने माना कि बेदखली और संपत्ति की बिक्री के खिलाफ रोक लगाने के लिए एक ‘प्रथम दृष्टया मामला’ बनता है।

* यथास्थिति (Status Quo): कोर्ट ने कहा कि यदि अभी निषेधाज्ञा नहीं दी गई, तो वादी को ऐसी अपूरणीय क्षति हो सकती है जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी।

अंतिम आदेश:

न्यायाधीश माननीय तरुणप्रीत कौर ने आदेश दिया कि मामले के अंतिम निपटारे तक प्रतिवादियों को संपत्ति में किसी भी प्रकार का ‘थर्ड पार्टी इंटरेस्ट’ पैदा करने और वादियों को वहां से बेदखल करने से रोका जाता है।

इसके साथ ही कोर्ट ने वादी के आवेदन (Order 39 Rule 1 & 2 CPC) को स्वीकार करते हुए इसे डिस्पोज कर दिया।

इस मामले में वादी की तरफ़ से प्रभावी पैरवी अधिवक्ता के के शर्मा ने की।

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विवेक कुमार जैन
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