इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मून गोयल को दी अग्रिम जमानत, कोर्ट में दी दलील कि सिविल विवाद को दिया गया है आपराधिक रंग

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आगरा/प्रयागराज ।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में आगरा के चर्चित मून गोयल की अग्रिम जमानत अर्जी को स्वीकार कर लिया है।

न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि यदि आवेदक को गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे संबंधित विचारण न्यायालय की संतुष्टि पर पचास हजार रुपये के व्यक्तिगत बंध पत्र और इतनी ही धनराशि के दो प्रतिभू प्रस्तुत करने पर जमानत पर रिहा कर दिया जाए ।

मामला और कोर्ट में दी गई दलीलें:

यह मामला आगरा जिले के थाना सिकंदरा में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 255/2025 से जुड़ा है, जिसमें आवेदक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(5), 338, 336 और 61(2) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

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सुनवाई के दौरान आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि यह पूरा विवाद विशुद्ध रूप से दीवानी (सिविल) प्रकृति का है, जिसे दुर्भावनापूर्ण तरीके से परेशान करने के उद्देश्य से आपराधिक रंग दिया गया है।

उनके द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया कि प्राथमिकी का मुख्य आधार 22 नवंबर 2023 का एक पश्चातवर्ती बंधक विलेख (सब्सिक्वेंट मॉर्टगेज डीड) है, जो कि एक अपंजीकृत दस्तावेज है और कानूनन इसके आधार पर आपराधिक दायित्व तय नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही आवेदक ने जांच और अदालती प्रक्रिया में पूरी तरह सहयोग करने का आश्वासन भी दिया।

दूसरी तरफ, परिवादी के अधिवक्ता के सहयोगी ने अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि घटना में आरोपी की भूमिका परिलक्षित हो रही है, इसलिए उसे राहत नहीं दी जानी चाहिए।

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कोर्ट का निर्णय और शर्तें:

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘सिद्धराम सतलिंगप्पा म्हेत्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में दिए गए विधिक सिद्धांतों का हवाला दिया, जिसके तहत अग्रिम जमानत पर विचार करते समय आरोपों की प्रकृति, गंभीरता और आरोपी की वास्तविक भूमिका का मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।

मामले के सभी तथ्यों, परिस्थितियों और दोनों पक्षों के तर्कों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने केस के गुण-दोष पर बिना कोई टिप्पणी किए अग्रिम जमानत की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया।

कोर्ट ने जमानत की मंजूरी के साथ कुछ अनिवार्य शर्तें भी लागू की हैं:

* आवेदक विचारण न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रत्येक तिथि पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होगा।

* आवेदक ऐसा कोई भी अपराध दोबारा नहीं करेगा, जिसका उस पर आरोप या संदेह है।

* आवेदक केस से जुड़े किसी भी गवाह या व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई प्रलोभन, धमकी या वादा नहीं करेगा और न ही साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ करेगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन किया जाता है, तो विचारण न्यायालय नियमानुसार आवेदक की जमानत रद्द करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगा।

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विवेक कुमार जैन
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