आगरा/प्रयागराज, 8 जुलाई 2025:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए हालिया आतंकवादी हमले के बाद सरकार पर सवाल उठाने वाले एक सोशल मीडिया पोस्ट के आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी है। आरोपी अजाज अहमद पर धारा 353 (3) और 152 भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस ) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की पीठ ने जमानत याचिका को स्वीकार करते हुए पाया कि अपर शासकीय अधिवक्ता यह साबित करने में विफल रहे कि आरोपी को राहत देने से समाज पर कोई बड़ा प्रभाव पड़ेगा या निष्पक्ष जांच पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
मामला तब शुरू हुआ जब थाना इज्जतनगर, बरेली के एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने अजाज अहमद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। एफआईआर में दावा किया गया था कि जब शहर में आतंकवादी हमले में मारे गए निर्दोष नागरिकों की मौत पर शोक का माहौल था, तब एक सोशल मीडिया पोस्ट वायरल हुई थी। इस पोस्ट में कथित तौर पर कहा गया था: “नाम पूछकर गोली मारी, चूरन बेचना बंद करें, असली मुद्दे पर आएं कि हमले के लिए जिम्मेदार कौन था”।
प्राथमिकी में आगे आरोप लगाया गया कि इस पोस्ट से सांप्रदायिक भावनाएं आहत हुईं और समाज में वैमनस्य फैल सकता है, खासकर ऐसे समय में जब लोग कैंडल मार्च और शांति अपील के लिए एकजुट हो रहे थे।
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आवेदक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह मामला धारा 353 बीएनएस के अंतर्गत आता है, जिसके लिए सात साल से कम कारावास की सजा का प्रावधान है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सरकार के काम की आलोचना करना देश के खिलाफ काम नहीं माना जा सकता है। अधिवक्ता ने दलील दी कि आवेदक निर्दोष है, उसका कोई आपराधिक इरादा नहीं है और उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है।
अदालत ने इस बात पर गौर किया कि ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया जिससे यह पता चले कि इस कृत्य से समाज को व्यापक नुकसान हुआ है, या अग्रिम जमानत देने से जांच पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ को बढ़ावा मिलेगा।
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने आरोप पत्र दाखिल होने तक याची को अग्रिम जमानत दे दी।
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