आगरा उपभोक्ता आयोग प्रथम का बिल्डर पर कड़ा प्रहार: फ्लैट का भुगतान और कब्जा मिलने के बावजूद रजिस्ट्री न करना ‘सेवा में कमी’, भारी जुर्माना

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आगरा।

जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-प्रथम, आगरा ने बिल्डरों की मनमानी पर अंकुश लगाते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है।

आयोग ने एन.आई.आई.एल. (NIIL) इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को आदेश दिया है कि वह फ्लैट खरीदारों के पक्ष में 45 दिनों के भीतर रजिस्ट्री (विक्रय विलेख) निष्पादित करे।

आयोग ने इसे ‘सेवा में गंभीर कमी’ मानते हुए बिल्डर पर प्रति केस 2.10 लाख रुपये तक का जुर्माना और हर्जाना लगाया है।

जानिये क्या थे मामले ?

आयोग के समक्ष ‘दि फ्लोरेंस प्लेटिनम बिल्डिंग’ (सिकंदरा) से जुड़े तीन अलग-अलग मामले सामने आए, जिनमें खरीदारों ने फ्लैट का पूर्ण भुगतान कर दिया था और उन्हें कब्जा भी मिल चुका था, लेकिन वर्षों से रजिस्ट्री अटकी हुई थी:

* डॉ. शुचिता सिंह: वर्ष 2012 में फ्लैट (G-704) बुक किया। 34 लाख रुपये का भुगतान किया और 2016 में कब्जा मिला। उन्होंने 1.84 लाख के स्टाम्प भी खरीद लिए थे, पर रजिस्ट्री नहीं हुई।

* डॉ. मालिनी सिंह (केस-1): वर्ष 2012 में फ्लैट बुक किया। 32 लाख रुपये का भुगतान किया और अप्रैल 2015 में कब्जा मिला। फ्लैट संख्या I-1/703 की रजिस्ट्री के लिए वर्षों इंतजार किया।

* डॉ. मालिनी सिंह (केस-2): वर्ष 2012 में ही फ्लैट संख्या I-2/704 के लिए 24.95 लाख रुपये का भुगतान किया। अप्रैल 2015 में कब्जा मिलने के बावजूद बिल्डर ने रजिस्ट्री करने में टाल-मटोल जारी रखी।

बिल्डर की दलीलें और आयोग का कड़ा रुख:

बिल्डर कंपनी ने बचाव में तर्क दिया कि उनका मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में लंबित है, खाते सीज हैं और मामला काफी पुराना होने के कारण समय सीमा (Limitation Period) से बाहर है।

आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य माननीय राजीव सिंह ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया:

* निरंतर वाद कारण: जब तक बिल्डर टाइटल (मालिकाना हक) ट्रांसफर नहीं करता, तब तक सेवा में कमी बनी रहती है और मामला कभी भी कालबाधित नहीं माना जा सकता।

* NCLT का बहाना नहीं चलेगा: एन.सी.एल.टी. में कार्यवाही चलने से उपभोक्ता के उन अधिकारों पर कोई फर्क नहीं पड़ता जो अनुबंध उल्लंघन से उत्पन्न हुए हैं।

* निदेशकों का उत्तरदायित्व: कंपनी के वर्तमान निदेशक पिछले सभी विधिक और अनुबंधित दायित्वों को पूरा करने के लिए कानूनन बाध्य हैं।

आयोग का निर्णायक आदेश:

न्यायालय ने तीनों ही मामलों में उपभोक्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बिल्डर को निम्नलिखित निर्देश दिए:

* रजिस्ट्री: आदेश के 45 दिनों के भीतर संबंधित फ्लैटों की रजिस्ट्री खरीदारों के नाम सुनिश्चित की जाए।

* मुआवजा: मानसिक पीड़ा और क्षतिपूर्ति के मद में प्रत्येक खरीदार को 2,00,000/- रुपये का भुगतान किया जाए।

* वाद व्यय: कानूनी कार्यवाही के खर्च के रूप में प्रति केस 10,000/- रुपये अतिरिक्त दिए जाएं।

* ब्याज की शर्त: यदि बिल्डर निर्धारित 45 दिनों में भुगतान और रजिस्ट्री नहीं करता है, तो उसे पूरी राशि पर 9% वार्षिक साधारण ब्याज देना होगा।

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विवेक कुमार जैन
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