आगरा उपभोक्ता आयोग प्रथम ने तथ्यों को छिपाने के आधार पर चिकित्सा बीमा क्लेम को किया ख़ारिज़

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आगरा ।

आगरा के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-प्रथम ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए चिकित्सा बीमा क्लेम के लिए दायर परिवाद को खारिज कर दिया है।

आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह की पीठ ने यह निष्कर्ष निकाला कि परिवादी ने बीमा पॉलिसी लेते समय अपने स्वास्थ्य से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया था।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, कालिन्दीपुरम निवासी नीरज भार्गव ने एचडीएफसी इरगो हैल्थ जनरल इंश्योरेंस कम्पनी के विरुद्ध 6,00,000/- रुपये की चिकित्सा क्षतिपूर्ति और ब्याज के लिए शिकायत दर्ज कराई थी।

परिवादी का कहना था कि वह वर्ष 2016 से लगातार अपनी पॉलिसी का नवीनीकरण करा रहा था और सितम्बर 2020 में बीमार होने के बाद रामवेद हॉस्पिटल और सर गंगाराम हॉस्पिटल में उनके इलाज पर लगभग 5,50,000/- रुपये खर्च हुए।

हालांकि, बीमा कंपनी ने उनके क्लेम को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि उनकी बीमारी अत्यधिक शराब के सेवन (अल्कोहलिक होने) के कारण हुई थी।

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बीमा कंपनी ने आयोग के समक्ष तर्क दिया कि परिवादी को एक्यूट नेक्रोटाइजिंग पैंक्रियाटाइटिस नामक बीमारी थी। कंपनी ने साक्ष्य के रूप में डॉक्टर के पर्चे प्रस्तुत किए, जिसमें उल्लेख था कि परिवादी पिछले 10 वर्षों से शराब का सेवन कर रहा था।

कंपनी का दावा था कि पॉलिसी की शर्तों के अनुसार, नशा या शराब के कारण होने वाली बीमारियों और तथ्यों को छिपाकर प्राप्त की गई पॉलिसी के तहत कोई क्षतिपूर्ति देय नहीं होती है।

आयोग ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों का सूक्ष्मता से परीक्षण किया। आयोग ने पाया कि इलाज करने वाले डॉक्टरों द्वारा तैयार किए गए इतिहास (हिस्ट्री) और पर्चों में स्पष्ट रूप से परिवादी के 10 साल से शराब पीने की बात दर्ज थी।

आयोग ने यह भी टिप्पणी की कि परिवादी द्वारा बाद में प्रस्तुत किया गया “नॉन-अल्कोहल” प्रमाण पत्र पिछले मेडिकल रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता और विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता है।

अपने निर्णय में आयोग ने कहा कि यह सिद्ध होता है कि परिवादी ने वर्ष 2016 में पॉलिसी लेते समय शराब के सेवन के संबंध में गलत जानकारी दी थी।

आयोग ने माना कि बीमा कंपनी ने पॉलिसी की शर्तों के उल्लंघन के आधार पर क्लेम खारिज करके सेवा में कोई कमी नहीं की है।

इसके साथ ही आयोग ने परिवाद को निरस्त कर दिया और पक्षों को अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने का निर्देश दिया।

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विवेक कुमार जैन
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