क्या अपराध के बाद घर गिराना ‘कार्यपालिका के विवेक का विकृत प्रयोग’ है ? इलाहाबाद हाईकोर्ट
आगरा/प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अपराध दर्ज होने के तत्काल बाद होने वाली ‘बुलडोजर कार्रवाई’ पर कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट रूप से पूछा कि क्या राज्य को किसी अपराधी के आवास को ध्वस्त करने का अधिकार है या उसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए ?
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला हमीरपुर जिले के भरुआ सुमेरपुर का है। याची फहीमुद्दीन और उनके परिजनों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनके एक रिश्तेदार (अफान) पर पॉक्सो एक्ट और अवैध धर्मांतरण कानून के तहत मामला दर्ज है।
याचियों का आरोप है कि इस अपराध के बाद प्रशासन ने उनके घर, लॉज और आरा मिल को सील कर दिया है और उन्हें डर है कि उनकी संपत्तियों पर बुलडोजर चलाया जा सकता है।
हाईकोर्ट द्वारा उठाए गए मुख्य विधिक सवाल
अदालत ने राज्य के विध्वंस अधिकार और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए निम्नलिखित प्रश्न उठाए हैं:
* कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका: क्या अपराध के तुरंत बाद विध्वंस करना कार्यपालक विवेक का ‘विकृत प्रयोग’ (Perverse Exercise of Discretion) है?
* सजा का अधिकार: क्या सरकार सजा के तौर पर किसी का घर गिरा सकती है? कोर्ट ने याद दिलाया कि सजा तय करना न्यायपालिका का अधिकार है, सरकार का नहीं।
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* सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश: क्या नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए बुलडोजर कार्रवाई संबंधी दिशा-निर्देशों का प्रदेश में पालन नहीं किया जा रहा है ?
* अनुच्छेद 14 और 21: नागरिकों को प्राप्त समानता और जीवन के अधिकार (Article 14 & 21) के विरुद्ध क्या इस तरह की कार्रवाई उचित है ?
सरकार का पक्ष और कोर्ट का अंतरिम आदेश:
राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने याचिका को ‘प्री-मेच्योर’ (समय से पूर्व) बताया।
उन्होंने तर्क दिया कि केवल नोटिस जारी किए गए हैं और आरा मिल को प्रतिबंधित लकड़ी के कारण सील किया गया है।
सरकार ने आश्वासन दिया कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के कोई विध्वंस नहीं होगा।
अदालत का फैसला:
खंडपीठ ने याचियों को राहत देते हुए पुलिस को निर्देश दिया है कि संपत्तियों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की जाए। कोर्ट ने कहा कि केवल ‘विध्वंस की उचित आशंका’ ही नागरिकों के अदालत आने का पर्याप्त आधार है।
अदालत ने इस मामले में अतिरिक्त प्रधान सचिव (राजस्व), जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक सहित अन्य अधिकारियों को प्रतिवादी बनाया है।
“न्यायालय ने महसूस किया कि राज्य को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह नागरिकों के अधिकारों का रक्षक है या विध्वंसकारी शक्ति का केंद्र।”
इस मामले में अगली सुनवाई नौ फ़रवरी को होगी ।
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