दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘शादी का झूठा वादा’ मामले में आरोपी को दी जमानत, अभियोजन पक्ष के मामले पर उठे प्रथम दृष्टया संदेह

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आगरा/नई दिल्ली:

दिल्ली हाई कोर्ट ने 09 दिसंबर, 2025 को मोहम्मद शाहिद इकबाल नामक एक व्यक्ति को नियमित जमानत दे दी, जिस पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 के तहत (शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाने) का आरोप था।

कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के मामले में प्रथम दृष्टया संदेह पैदा करने वाले कई विरोधाभास और तथ्य सामने आए हैं, जैसे कि आरोपी का उस समय हज पर न होना जब पीड़िता ने शादी के प्रस्ताव का दावा किया था।

न्यायमूर्ति अमित महाजन की एकल पीठ ने बेल अपील पर फैसला सुनाते हुए आरोपी को ₹20,000/- के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।

मामले के प्रमुख बिंदु:

* FIR: यह मामला FIR संख्या 17/2025, दिनांक 09.01.2025 को PS चाँदनी महल में BNS की धारा 69 के तहत दर्ज किया गया था।

* आरोप: पीड़िता ने आरोप लगाया था कि 2018 में संपर्क में आने के बाद, आरोपी ने 2019 में हज से वीडियो कॉल पर निकाह का प्रस्ताव दिया, जिसे उसने स्वीकार कर लिया। इसके बाद, उसने शादी का झांसा देकर कई बार शारीरिक संबंध बनाए। आरोपी पर पीड़िता के गहने और दो संपत्तियां लेने का भी आरोप था।

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* गिरफ्तारी और हिरासत: आरोपी को 19.01.2025 को गिरफ्तार किया गया था और वह 10 महीने से अधिक समय से हिरासत में है।

* पिछले घटनाक्रम: आरोपी की पिछली नियमित जमानत याचिका 19.08.2025 को पीड़िता की जांच के बाद दोबारा याचिका दायर करने की स्वतंत्रता के साथ खारिज कर दी गई थी। पीड़िता का बयान अब ट्रायल कोर्ट में दर्ज किया जा चुका है।

कोर्ट का अवलोकन और संदेह:

जमानत याचिका पर विचार करते हुए, कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के मामले पर प्रथम दृष्टया संदेह पैदा होता है:

* हज यात्रा की तारीख पर विरोधाभास: पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने 2019 में हज से शादी का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, आरोपी के वकील ने पासपोर्ट पर इमिग्रेशन स्टैंप दिखाते हुए तर्क दिया कि आरोपी केवल 19.07.2018 को हज गया था और 01.09.2018 को लौट आया था। कोर्ट ने माना कि यह तथ्य प्रथम दृष्टया शादी के प्रस्ताव के आरोप पर संदेह पैदा करता है।

* संपत्ति बिक्री के भुगतान का विरोधाभास: एक संपत्ति खरीदार, राशिद के BNSS की धारा 180 के तहत दिए गए बयान के अनुसार, उसने ₹25,00,000/- में से ₹20,00,000/- सीधे पीड़िता को और बाकी ₹5,00,000/- उसके भाइयों को दिए थे। यह आरोप के विपरीत था कि आरोपी ने बिक्री की पूरी राशि स्वयं रख ली थी।

* ज्वैलरी के बयान में विरोधाभास: पीड़िता ने BNSS की धारा 180 के तहत दिए गए अपने बयान में कहा था कि उसने गहने खुद आरोपी को सौंपे थे, जबकि ट्रायल कोर्ट में अपनी गवाही के दौरान उसने कहा कि आरोपी और उसके भाई ने उसके गहने अलमारी से निकाले थे।

* विवाहित होने की जानकारी: पीड़िता ने अपनी गवाही में स्वीकार किया कि वह 2018 में जब आरोपी से मिली थी, तब वह जानती थी कि आरोपी विवाहित था।

* पहले के मामले का निस्तारण: अभियोजन पक्ष ने आरोपी के पुराने आपराधिक इतिहास का उल्लेख किया, लेकिन कोर्ट ने नोट किया कि FIR संख्या 79/2011 को इस कोर्ट ने 21.02.2014 के आदेश से रद्द (quashed) कर दिया था।

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जमानत का आधार:

कोर्ट ने टिप्पणी की कि क्या आरोपी ने सहमति लेने के लिए झूठा दावा किया और उसकी संपत्ति हड़पी, यह विचारण का विषय है। हालांकि, 10 महीने से अधिक की हिरासत, जांच का पूरा होना और चार्जशीट दाखिल होना, और आरोपी के समाज में गहरी जड़ें होने तथा तीन बच्चों की जिम्मेदारी जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने उसे जमानत के लिए उपयुक्त पाया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियाँ केवल जमानत याचिका का फैसला करने के लिए हैं और ट्रायल के परिणाम को प्रभावित नहीं करेंगी।

जमानत की शर्तें:

आरोपी को निम्नलिखित शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया गया है:

* वह साक्ष्यों के साथ किसी भी तरह से छेड़छाड़ नहीं करेगा।

* वह कोर्ट की अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेगा।

* वह ट्रायल कोर्ट के सामने निर्देशित होने पर उपस्थित होगा।

* वह अपना पता प्रदान करेगा और संबंधित IO/SHO को सूचित किए बिना पता नहीं बदलेगा।

* वह अपना मोबाइल नंबर IO/SHO को देगा और उसे हमेशा ऑन रखेगा। आरोपी मोहम्मद शाहिद इक़बाल की तरफ़ से प्रभावी पैरवी अधिवक्ता गण घनश्याम शर्मा, विकास शर्मा, लक्ष्य महाजन और सुश्री शिवांगी चंद द्वारा की गई ।

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विवेक कुमार जैन
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