आगरा:
आगरा की प्रसिद्ध बेदरिया राम गजक के व्यापार को लेकर हुए विवाद में अपने बड़े भाई की हत्या के दोषी हरी सिंह को आगरा की एडीजे अदालत 26 के न्यायाधीश माननीय अमरजीत ने आजीवन कारावास और 1 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है।
इस मामले में, आरोपी ने अपने भाई पर तलवार से हमला किया था, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। न्यायालय ने इस अपराध को “कठोर मानसिक अवस्था” का परिणाम बताया और अभियुक्त की उम्र या बीमारी के आधार पर कोई उदारता नहीं दिखाई।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह घटना 16 नवंबर 2007 को ताजगंज क्षेत्र में हुई थी, जब वादी विमल कुमार अपने पिता गुमान सिंह और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ व्यापार के संबंध में बात कर रहे थे। उसी समय, हरी सिंह, जो उनके मकान के सामने रहते थे और उन्हीं की तरह गजक का व्यापार करते थे, अपने बेटों पुनीत, विनीत उर्फ वीनू और केशव पाल के साथ हथियारों से लैस होकर आए।
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अभियोजन पक्ष के अनुसार, हरी सिंह के पास तलवार थी, जबकि अन्य आरोपियों के पास डंडे थे। उन्होंने गाली-गलौज शुरू की, और जब मना किया गया, तो हरी सिंह ने अपने भाई गुमान सिंह के सिर पर तलवार से वार कर दिया।
हमले के बाद, आरोपी “साले आज तो बच गए हो, अबकी बार जान से मार देंगे” कहते हुए मौके से फरार हो गए। गुमान सिंह को गंभीर चोटें आईं, और इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद, 17 जनवरी 2008 को पुलिस ने हरी सिंह को गिरफ्तार किया और उनकी निशानदेही पर वह तलवार भी बरामद की गई जिस पर खून लगा हुआ था।
बचाव और अभियोजन पक्ष के तर्क:
अभियुक्त हरी सिंह के वकील अभय पाठक ने सजा के बिंदु पर दलील दी कि हरी सिंह एक वृद्ध और बीमार व्यक्ति हैं और न्यायालय को उनके प्रति उदारता दिखानी चाहिए।
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वकील ने अपने दावों के समर्थन में कुछ चिकित्सा दस्तावेज भी पेश किए।इसके विपरीत, अभियोजन पक्ष की तरफ़ से अधिवक्ता अरविंद शर्मा ने कड़ी सजा की मांग की।
सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता सुभाष गिरी ने कहा कि आरोपी ने वादी और अन्य लोगों के साथ मारपीट, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी दी। उन्होंने कहा कि यह अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति का है और आरोपी का आपराधिक इतिहास भी है। इसलिए, उन्हें कठोरतम दंड दिया जाना चाहिए।
न्यायालय का फैसला:
न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि यह स्पष्ट है कि हरी सिंह ने अपने सगे बड़े भाई के सिर पर तलवार से वार किया, जो कि एक “मर्म भाग” (महत्वपूर्ण अंग) है।
न्यायालय के अनुसार, यह हमला आरोपी के “आशय” को दर्शाता है। न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि हमला करते समय आरोपी ने यह भी नहीं सोचा कि वह जिस व्यक्ति पर हमला कर रहा है, वह उसका सगा भाई है और झगड़ा सिर्फ व्यापारिक उत्तराधिकार का था।
न्यायालय ने कहा कि यह कृत्य “नैतिकता के विरुद्ध होने के साथ-साथ गंभीर अपराध भी है।” हालांकि बचाव पक्ष ने अभियुक्त के बीमार होने का तर्क दिया था, लेकिन न्यायालय ने इसे अपराध की गंभीरता के सामने पर्याप्त नहीं माना।
इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने फैसला सुनाया कि न्याय के उद्देश्य की पूर्ति के लिए हरी सिंह को दंडित किया जाना आवश्यक है।
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दंडादेश:
न्यायालय ने निम्नलिखित दंडादेश सुनाया:
* धारा 304 (भाग-1) भारतीय दंड संहिता के तहत: अभियुक्त हरी सिंह को आजीवन कारावास और 1 लाख रुपये का अर्थदंड। यदि वह अर्थदंड अदा नहीं करते हैं, तो उन्हें छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
* धारा 504 भारतीय दंड संहिता के तहत: अभियुक्त हरी सिंह को छह माह का साधारण कारावास और 10,000 रुपये का अर्थदंड।
इस मामले में, हरी सिंह के अलावा अन्य आरोपी, पुनीत, विनीत उर्फ वीनू और केशव पाल, अनुपस्थित थे, जिसके कारण उनकी फाइलें अलग कर दी गई थीं।
यह फैसला एक कड़ा संदेश देता है कि पारिवारिक संबंधों में भी किए गए गंभीर अपराधों को न्यायालय द्वारा गंभीरता से लिया जाता है ।
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