आगरा/नई दिल्ली:
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि शादी से पहले अपने वैवाहिक इतिहास को छिपाना एक गंभीर धोखा है, न कि कोई मामूली गलती।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा कृत्य विवाह की नींव को ही कमजोर कर देता है और यह ‘तथ्यों का दमन’ (Suppression of facts) है। इस तरह की शादी को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12 के तहत रद्द किया जा सकता है।

जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा,
“इस तरह के महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने से स्वतंत्र और सूचित सहमति की बुनियाद हिल जाती है, जिसके कारण विवाह धारा 12(1)(सी ) के तहत रद्द करने योग्य हो जाता है।”

यह फैसला एक पति की अपील को खारिज करते हुए आया, जिसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी पत्नी की याचिका पर उनके विवाह को रद्द कर दिया गया था।
फैमिली कोर्ट ने यह पाया था कि पति ने न केवल अपनी पिछली शादी की जानकारी छिपाई, बल्कि उसने अपनी आय के बारे में भी गलत जानकारी दी थी।

ऐसे हुआ खुलासा:
मामले के अनुसार, पति ने एक लोकप्रिय मैट्रिमोनियल वेबसाइट शादी डॉट कॉम पर अपनी प्रोफाइल ‘कभी शादी नहीं की’ (Never Married) के रूप में बनाई थी।
पत्नी ने इसी झूठी जानकारी पर भरोसा करते हुए शादी के लिए सहमति दी थी। कोर्ट ने माना कि इस तरह का जानबूझकर किया गया झूठ विवाह को रद्द करने का पर्याप्त आधार है।
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