आगरा।
सुल्तानगंज की पुलिया के समीप चल रहे आगरा मेट्रो के निर्माण कार्य पर रोक लगाने की मांग वाली एक अहम अपील को सत्र न्यायालय ने खारिज कर दिया है।
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे 25) माननीय मदन मोहन की अदालत ने मेट्रो प्रोजेक्ट को लोकहित और समयबद्ध कार्य मानते हुए पूर्व में सिविल जज द्वारा दिए गए आदेश को सही ठहराया है। इस फैसले के बाद मेट्रो निर्माण का कार्य निर्बाध गति से चलने का रास्ता साफ हो गया है।
न्यायिक विवरण के अनुसार, मेसर्स डेवलपमेंट ट्रस्ट प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर समीर गुप्ता (निवासी सूर्य नगर, आगरा) ने उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड के विरुद्ध एक सिविल वाद (स्थाई निषेध आज्ञा) दायर किया था।
वादी का आरोप था कि वह मौजा लश्करपुर, आगरा के खसरा संख्या 403 में स्थित प्लॉट संख्या 108 से 129 का मालिक है और संपत्ति पर काबिज है। वादी के अनुसार, यह संपत्ति 1947 और 1948 के गजट नोटिफिकेशन के तहत प्रदान की गई थी, जिसके बाद उन्होंने न्यू आगरा और गांधी नगर आवासीय कॉलोनियां विकसित कर स्थानीय निकायों को सौंपी थीं।
वादी का दावा था कि गांधी नगर कॉलोनी के लेआउट प्लान और आगरा विकास प्राधिकरण के अनुमोदन के बाद, प्लॉट संख्या 109 से 113 पर कमर्शियल बिल्डिंग के निर्माण के लिए 5 फरवरी 1983 को जिलाधिकारी द्वारा अनुमति दी गई थी और संपत्ति रेवेन्यू रिकॉर्ड में उनके नाम दर्ज है।
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याचिका में आरोप लगाया गया कि उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉरपोरेशन द्वारा भू-अधिग्रहण अधिनियम 2013 की प्रक्रिया अपनाए बिना और कोई अधिसूचना जारी किए बिना ही संपत्ति पर निर्माण कार्य किया जा रहा है। वादी ने मेट्रो कॉरपोरेशन के प्रवेश और निर्माण पर प्रतिबंध लगाने (परमानेंट स्टे) की मांग की थी।
निचली अदालत यानी सिविल जज ने 16 अक्टूबर 2025 को इस याचिका को खारिज कर दिया था। सिविल जज के इस आदेश के खिलाफ वादी ने सत्र न्यायालय में अपील प्रस्तुत की थी।
अपील की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (सिविल) राजेश कुमार कुलश्रेष्ठ ने मजबूती से अपना पक्ष रखा।
उन्होंने अदालत को बताया कि खसरा नंबर 403 में सुल्तानगंज मेट्रो स्टेशन का निर्माण किया जा रहा है। यह केंद्र और राज्य सरकार का संयुक्त प्रोजेक्ट है, जिसे व्यापक लोकहित में निष्पादित किया जा रहा है और इसका समयबद्ध पूरा होना अनिवार्य है। अपने तर्कों के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की नजीर भी पेश की।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद एडीजे 25 माननीय मदन मोहन ने मेट्रो कॉरपोरेशन के अधिवक्ता के तर्कों को स्वीकार करते हुए वादी की अपील निरस्त करने के आदेश पारित कर दिए।
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