सर्वोच्च अदालत ने 3 वर्षीय बच्चे के साथ यौन शोषण करने वाले पिता पर कथित रूप से झूठा आरोप लगाने वाली मां के खिलाफ की गई एफआईआर पर लगाई रोक

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आगरा / नई दिल्ली 13 सितंबर ।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केरल हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई, जिसके तहत यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण पोस्को अधिनियम के तहत बच्चे के पिता के खिलाफ कथित रूप से झूठा मामला दर्ज करने के लिए मां के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने मां के खिलाफ हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों पर रोक लगा दी और एफआईआर में कार्यवाही पर रोक लगाई।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस एन.के. सिंह की खंडपीठ के समक्ष आया कि केरल हाईकोर्ट के एकल जज जस्टिस पी.वी. कुन्हीकृष्णन द्वारा लगाए गए आदेश के पैरा ’16’ में की गई टिप्पणियों के अनुसरण में याचिकाकर्ता (पत्नी) के खिलाफ केरल पुलिस अधिनियम की धारा 117 के साथ पॉक्सो की धारा 22 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है।

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एक मामले में जहां मां ने आरोप लगाया था कि पिता ने उनके 3 साल के बच्चे का यौन उत्पीड़न किया, केरल हाईकोर्ट ने देखा कि बच्चे की कस्टडी पाने के गुप्त उद्देश्य से मां द्वारा “तुच्छ शिकायत” दर्ज कराई गई। यह देखते हुए कि बाल-पीड़ित के 164 सीआरपीसी बयान में उसने मां के खिलाफ गवाही दी।

कोर्ट ने कहा:
“यहां तक कि 3 साल की बच्ची जिसे अपने पिता के खिलाफ गवाही देने के लिए प्रशिक्षित किया गया, उसने मजिस्ट्रेट के सामने गवाही दी कि वह अपनी मां से ज्यादा अपने पिता को पसंद करती है। यह एक उपयुक्त मामला है, जिसमें याचिकाकर्ता जो कि पीड़िता का पिता है, उसके खिलाफ अभियोजन को उपरोक्त चर्चाओं के आलोक में रद्द किया जाना चाहिए।”

पिता के खिलाफ अभियोजन रद्द करते समय हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि

“मेरा विचार है कि पोस्को न्यायालय जो इस तरह के मामलों की सुनवाई करते हैं, जिसमें नाबालिग बच्चे के पिता के खिलाफ यौन शोषण का आरोप लगाया जाता है, खासकर जब बच्चे की कस्टडी का विवाद होता है तो अदालत को मामलों का फैसला करने से पहले बार-बार तथ्यों पर गौर करना चाहिए। सभी मामलों का फैसला सभी अदालतों द्वारा बहुत सावधानी से किया जाएगा। लेकिन इस तरह के मामलों को बहुत गंभीरता से निपटाया जाना चाहिए, क्योंकि अगर आरोप सही हैं तो यह गंभीर है लेकिन अगर आरोप झूठे हैं तो व्यक्ति बिना किसी आधार के सूली पर चढ़ा दिया जाता है। ऐसे आरोपों के कारण उसे समाज में बदनाम किया जाता है।”

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हाईकोर्ट ने टिप्पणी की,

“इसलिए न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह देखे कि माता-पिता के विरुद्ध कोई झूठा आरोप न लगाया जाए, खासकर तब जब बच्चे की कस्टडी को लेकर कोई विवाद हो। इसके अलावा पोस्को अधिनियम की धारा 22 में झूठी शिकायत या झूठी सूचना के लिए दंड का प्रावधान है। उचित मामलों में यदि पोस्को अधिनियम की धारा 22 के अंतर्गत प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो न्यायालय को जांच के लिए पुलिस को सूचित करना चाहिए। यह एक उपयुक्त मामला है, जिसमें अपराध नंबर 668/2015 में जांच अधिकारी को यह विचार करना होगा कि क्या पोस्को अधिनियम की धारा 22 के अंतर्गत कोई अपराध दूसरे प्रतिवादी द्वारा किया गया ?
पोस्को अधिनियम की धारा 22 में कहा गया कि कोई भी व्यक्ति जो किसी व्यक्ति के विरुद्ध धारा 3, 5, 7 और 9 के अंतर्गत किसी अपराध के संबंध में केवल अपमानित करने, जबरन वसूली करने, धमकी देने या बदनाम करने के इरादे से झूठी शिकायत करता है या झूठी सूचना देता है, उसे छह महीने तक के कारावास या जुर्माने या दोनों से दंडित किया जाएगा। इस अपराध में जांच अधिकारी द्वारा इस मामले पर विचार किया जाना चाहिए। सभी पोस्को न्यायालयों को इस संबंध में उचित कदम उठाने चाहिए यदि यह पाया जाता है कि शिकायतकर्ताओं द्वारा कोई झूठी शिकायत या गलत जानकारी प्रस्तुत की गई है। यदि पोस्को न्यायालय ने परीक्षण के बाद पाया कि आरोपी के मामले में यह तथ्य है कि यह एक झूठा आरोप है, तो पोस्को न्यायालय को पुलिस अधिकारियों को पोस्को अधिनियम की धारा 22 के तहत मामला दर्ज करने और कानून के अनुसार आगे बढ़ने का निर्देश देना चाहिए।”

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विवेक कुमार जैन
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