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सुप्रीम कोर्ट ने जातिगत भेदभाव पर स्टोरी करने वाले पत्रकार के विरुद्ध उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर पर किया अंतरिम संरक्षण प्रदान

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आगरा 24 अक्टूबर ।

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के प्रशासन में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाने वाले अपने लेख के लिए गिरफ्तार किए गए अन्य पत्रकार को अंतरिम संरक्षण प्रदान किया।

जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने पत्रकार-ममता त्रिपाठी के पक्ष में आदेश पारित किया, जिनके खिलाफ 4 एफआईआर दर्ज किए जाने की बात कही गई। कोर्ट ने त्रिपाठी की उनके खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की याचिका पर यूपी सरकार से जवाब मांगा।

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जस्टिस गवई ने आदेश सुनाते हुए कहा,

“4 सप्ताह में वापस करने योग्य नोटिस जारी करें। इस बीच यह निर्देश दिया जाता है कि संबंधित लेखों के संबंध में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी बलपूर्वक कदम न उठाया जाए।”

बता दें कि अन्य पत्रकार यानी अभिषेक उपाध्याय ने हाल ही में उत्तर प्रदेश राज्य प्रशासन में जातिगत गतिशीलता की खोज करने वाले लेख पर यूपी पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

4 अक्टूबर को न्यायालय ने उन्हें अंतरिम संरक्षण प्रदान करते हुए कहा कि पत्रकारों के खिलाफ केवल इसलिए आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि उनके लेखन को सरकार की आलोचना माना जाता है।

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जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने अपने आदेश में कहा,

“लोकतांत्रिक देशों में अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है। पत्रकारों के अधिकारों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत संरक्षित किया गया। केवल इसलिए कि किसी पत्रकार के लेखन को सरकार की आलोचना माना जाता है, लेखक के खिलाफ आपराधिक मामला नहीं चलाया जाना चाहिए।”

ममता त्रिपाठी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने तर्क दिया कि अब तक 4 एफआईआर दर्ज की गई। न्यायालय ने पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को दी गई सुरक्षा के परिणामस्वरूप उनके विरुद्ध के गई एक एफआईआर पर रोक लगा दी।

उन्होंने आग्रह किया कि यह शुद्ध उत्पीड़न का मामला है, क्योंकि जब भी पत्रकार कुछ ट्वीट करते हैं, चाहे वह जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अपने वाहनों पर लाल बत्ती का उपयोग करने के बारे में हो, या ठाकुरों और ब्राह्मणों के बीच जातिगत मुद्दों के बारे में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाती है।

जस्टिस गवई ने जब पूछा कि याचिकाकर्ता ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया तो सीनियर एडवोकेट ने जवाब दिया कि उपाध्याय ने भी सीधे संपर्क किया।

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ऐसा ही किया जा रहा है, क्योंकि याचिकाकर्ता-पत्रकारों का मामला यह है कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।

अंततः पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया और त्रिपाठी को उनके द्वारा लिखे गए 6 लेखों के संबंध में अंतरिम संरक्षण प्रदान किया।

केस टाइटल: ममता त्रिपाठी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

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साभार: लाइव लॉ

विवेक कुमार जैन
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