आगरा।
तय समय सीमा में फ्लैट का निर्माण कर कब्जा न देने और ग्राहकों की गाढ़ी कमाई वापस न करने के एक मामले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (द्वितीय) ने बिल्डर कंपनी के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है।
आयोग ने एन.आई.आई.एल. इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को आदेश दिया है कि वह वादी को 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 47 लाख 25 हजार रुपये की धनराशि वापस करे।
इसके साथ ही, मानसिक पीड़ा और अदालती खर्चे के एवज में एक लाख रुपये अतिरिक्त देने का भी निर्देश दिया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि:
इस संबंध में न्यू आगरा निवासी राजवीर सिंह (पुत्र संतोष पाल सिंह) ने अपने अधिवक्ता नरेश शर्मा के माध्यम से आयोग के समक्ष वाद प्रस्तुत किया था।
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वादी के अनुसार, उनकी माता श्रीमती द्रोपदी देवी ने अपने जीवन काल में सितंबर 2012 में सिकंदरा स्थित कामायनी हॉस्पिटल के निकट ‘द फ्लोरेंस प्लेटिनम बिल्डिंग’ में एक 4 बी.एच.के. फ्लैट बुक कराया था।
फ्लैट की कुल कीमत 52 लाख 25 हजार रुपये तय हुई थी, जिसका पूरा भुगतान विपक्षी बिल्डर (एन.आई.आई.एल. इंफ्रास्ट्रक्चर) को कर दिया गया था।
बिल्डर ने समझौता किया था कि वह 36 महीने के भीतर फ्लैट का निर्माण कार्य पूरा कर उसका कब्जा (पजेशन) वादी पक्ष को सौंप देगा।
वादी को कैसे मिला अधिकार और बिल्डर की मनमानी:
22 सितंबर 2016 को वादी की माता श्रीमती द्रोपदी देवी का निधन हो गया। इसके बाद पारिवारिक सदस्यों की आपसी सहमति से हुए बंटवारे में यह फ्लैट वादी राजवीर सिंह के हिस्से में आया।
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तय समय बीत जाने के बाद भी जब विपक्षी बिल्डर ने न तो फ्लैट का निर्माण पूरा कर कब्जा दिया और न ही धनराशि वापस की, तो वादी ने बिल्डर पर दबाव बनाया।
अत्यधिक दबाव के बाद विपक्षी बिल्डर द्वारा वादी को मात्र 5 लाख रुपये का आंशिक भुगतान किया गया, लेकिन शेष रकम लौटाने से वह कतराता रहा।
उपभोक्ता आयोग का फैसला:
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद, जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (द्वितीय) के अध्यक्ष माननीय आशुतोष और सदस्य पारुल कौशिक की पीठ ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाया।
आयोग ने बिल्डर की सेवा में घोर कमी मानते हुए निम्नलिखित आदेश पारित किए:
* विपक्षी बिल्डर शेष धनराशि 47 लाख 25 हजार रुपये वादी को लौटाएगा।
* इस धनराशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज भी देय होगा।
* वादी को हुई मानसिक परेशानी और कानूनी खर्चे (वाद व्यय) की क्षतिपूर्ति के रूप में बिल्डर एक लाख रुपये का अतिरिक्त भुगतान करेगा।
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