आगरा।
न्यायिक आदेशों को हल्के में लेना भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की मुख्य शाखा, छिपीटोला के प्रबंधक को महंगा पड़ गया है।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) माननीय मृत्युंजय श्रीवास्तव ने शाखा प्रबंधक के अड़ियल रवैये पर सख्त नाराजगी जताते हुए उनके खिलाफ 10 हजार रुपये का जमानतीय वारंट जारी किया है।
साथ ही थानाध्यक्ष रकाबगंज को वारंट की तामील कराने के निर्देश दिए हैं।
26 साल पुराने मामले में मिली थी दोषमुक्ति:
मामला वर्ष 1998 का है, जब थाना शाहगंज में विनोद नामक व्यक्ति के विरुद्ध धोखाधड़ी और कॉपीराइट एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था।
इस मामले में जमानत के लिए विनोद ने अपनी एफडी (FD) अदालत में बंधक के रूप में प्रस्तुत की थी।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 14 अक्टूबर 2024 को सीजेएम कोर्ट ने विनोद को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
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मैनेजर ने आदेश मानने से किया इंकार:
दोषमुक्त होने के बाद विनोद ने अपनी एफडी वापस पाने के लिए प्रार्थना पत्र दिया, जिस पर अदालत ने 10 सितंबर 2025 को एफडी डिस्चार्ज करने का आदेश जारी किया।
जब विनोद कोर्ट के आदेश की प्रति लेकर बैंक मैनेजर के पास पहुंचा, तो मैनेजर ने भुगतान करने से इंकार कर दिया। मैनेजर का तर्क था कि आदेश में बैंक को कोई सीधा निर्देश नहीं है और यह मामला अदालत और विनोद के बीच का है।
अदालत ने माना न्यायिक कार्य में बाधा:
बैंक मैनेजर के इस व्यवहार की जानकारी जब सीजेएम माननीय मृत्युंजय श्रीवास्तव को हुई, तो उन्होंने इसे न्यायालय के प्रति उपेक्षा और न्यायिक कार्य में बाधा माना।
अदालत ने धारा 388 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत मैनेजर को कारण बताओ नोटिस जारी कर 30 मार्च को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया था।
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हाजिर न होने पर जारी हुआ वारंट:
निर्धारित तिथि पर बैंक प्रबंधक न तो अदालत में हाजिर हुए और न ही कोई स्पष्टीकरण पेश किया।
प्रबंधक की इस कार्यप्रणाली को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने अब उनके विरुद्ध पुनः नोटिस के साथ 10 हजार रुपये का जमानतीय वारंट जारी कर दिया है।
थानाध्यक्ष रकाबगंज को आदेश दिए गए हैं कि वे बैंक प्रबंधक की कोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित कराएं।
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