आगरा/नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए देशभर के हाईकोर्ट्स और ट्रायल कोर्ट्स को जमानत और अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) से जुड़ी याचिकाओं को जल्द से जल्द निपटाने के लिए कहा है। कोर्ट ने सुझाव दिया है कि ऐसी याचिकाओं का निपटारा प्राथमिकता के आधार पर 3 से 6 महीने के भीतर किया जाना चाहिए।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि जमानत याचिकाएं सीधे तौर पर किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) से जुड़ी होती हैं। इसलिए, इन्हें वर्षों तक लंबित रखना न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।

कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,
“व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ी याचिकाएं सालों तक लंबित नहीं रखी जा सकतीं। लंबी देरी से न केवल आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) का उद्देश्य प्रभावित होता है, बल्कि यह न्याय से वंचित करने के बराबर है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 की भावना के खिलाफ है।”
मामला क्या था ?
यह निर्देश एक ऐसे मामले के संदर्भ में दिया गया, जहां एक अग्रिम जमानत याचिका 2019 में दायर की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे 2025 तक लंबित रखा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपनी कड़ी नाराजगी व्यक्त की और इस तरह की प्रथा की निंदा की।
मामले की पृष्ठभूमि में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया था।
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इन आरोपियों पर आईपीसी की धारा 420, 463, 464, 465, 467, 468, 471 और 474 के तहत जालसाजी और जमीन के अवैध हस्तांतरण के आरोप थे। दो आरोपियों ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की अपील को खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि आरोपी गिरफ्तार होते हैं, तो वे नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
इसी मामले में सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को जमानत याचिकाओं पर त्वरित कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
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