भैंस चोरी के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल; साक्ष्य के अभाव में चार आरोपी बरी

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आगरा।

जनपद के थाना बसई अरेला क्षेत्र में हुई भैंस चोरी के एक चर्चित मामले में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ-25) माननीय मदन मोहन की अदालत ने पुलिसिया दावों को दरकिनार करते हुए चारों आरोपियों को बरी करने के आदेश दिए हैं।

अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस साक्ष्य पेश करने में विफल रहा।

क्या था मामला ?

वादी राजेश सिंह के अनुसार, 19 जुलाई 2024 की रात उनके घर के बाहर खूंटे से बंधी दो भैंसें (पड़िया) चोरी हो गई थीं। आरोप था कि अज्ञात चोरों ने एक मैक्स गाड़ी में भैंसों को लादा था, जिसके साथ एक कार भी चल रही थी।

पुलिस ने इस मामले में 1 अगस्त 2024 (घटना के 12 दिन बाद) मुकदमा दर्ज किया था।

पुलिस ने इस चोरी के आरोप में इमरान उर्फ बबुआ, भईये, अफसर और मुस्तकीम उर्फ बड्डी को गिरफ्तार कर जेल भेजा था।

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पुलिस की ‘लचर’ विवेचना पर अधिवक्ताओं के तर्क:

आरोपियों की अधिवक्ता प्रियांशी गर्ग एवं अन्य सहयोगियों ने अदालत के समक्ष पुलिस की कहानी की धज्जियां उड़ाते हुए निम्नलिखित तर्क रखे:

* देरी से FIR: घटना 19 जुलाई की थी, लेकिन पुलिस ने 12 दिन बाद 1 अगस्त को मुकदमा दर्ज किया, जिसका कोई उचित कारण नहीं था।

* फर्जी बरामदगी का आरोप: बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपियों को किसी अन्य मामले में गिरफ्तार किया गया था और बाद में इस मुकदमे में संलिप्त कर दिया गया।

* साक्ष्यों का अभाव: विवेचक ने बरामदगी का कोई भी स्वतंत्र गवाह नहीं बनाया और न ही बरामदगी स्थल का कोई ‘नक्शा नजरी’ (Spot Map) अदालत में पेश किया।

* गवाहों के विरोधाभास: मामले में वादी राजेश सिंह, एफआईआर लेखक प्रेम देव और सब-इंस्पेक्टर छोटे लाल की गवाही हुई, लेकिन वे आरोपियों के खिलाफ अपराध सिद्ध करने में नाकाम रहे।

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अदालत का फैसला:

विद्वान न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि पुलिस की कहानी में कई झोल हैं और बरामदगी की प्रक्रिया कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतरती।

साक्ष्य के अभाव (Benefit of Doubt) का लाभ देते हुए अदालत ने इमरान, भईये, अफसर और मुस्तकीम को दोषमुक्त कर बरी करने के आदेश जारी किए।

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विवेक कुमार जैन
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