आगरा:
सत्र न्यायालय ने 2010 में हुई एक ट्रांसपोर्ट व्यवसायी की हत्या के मामले में तीन आरोपितों को साक्ष्य के अभाव में बरी करने का आदेश दिया है।
अपर जिला न्यायाधीश-1 (ADJ-1) माननीय राजेन्द्र प्रसाद की अदालत ने यह फैसला सुनाया।
बरी किए गए आरोपितों में महावीर सिंह (सिकंदरा निवासी), आकाश, और विकास (दोनों गढ़ी त्रिखा, फरह, मथुरा निवासी) शामिल हैं।
2010 में हुई थी ट्रांसपोर्ट व्यवसायी की हत्या:
यह मामला थाना सिकंदरा में 27 अगस्त 2010 को दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता श्रीमती गुरमीत कौर, निवासी गुरु तेग बहादुर कॉलोनी, ने आरोप लगाया था कि उनके पति महेंद्र सिंह (एक ट्रांसपोर्ट व्यवसायी) की 21 मई 2010 की रात उनके घर पर हत्या कर दी गई थी।
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शिकायतकर्ता ने बताया कि उनके पति हमेशा सोने का वजनी कड़ा और अंगूठी पहनते थे, और उनकी हत्या लूट के उद्देश्य से सिर पर हथौड़ा मारकर की गई थी। उन्होंने शक के आधार पर उपरोक्त तीनों व्यक्तियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कराया था।
पुलिस जांच पर उठे सवाल:
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पुलिस और अभियोजन पक्ष हत्या के आरोप को सिद्ध करने में विफल रहे।
आरोपितों के अधिवक्ता विजेंद्र सिंह और तेजेंद्र राजपूत ने तर्क दिया कि पुलिस की जांच में कई गंभीर त्रुटियाँ थीं:
* देरी से FIR: घटना 21 मई 2010 को हुई थी, जबकि मृतक की पत्नी ने मुक़दमा लगभग तीन माह की देरी से 27 अगस्त 2010 को दर्ज कराया।
* बरामदगी में विफलता: हत्या का उद्देश्य लूट बताया गया था, लेकिन पुलिस मृतक के हाथ से लूटा गया सोने का कड़ा और अंगूठी बरामद नहीं कर सकी।
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* विधि विज्ञान प्रयोगशाला की अनदेखी: पुलिस ने आरोपितों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हथौड़ा तो बरामद किया, लेकिन उसे निर्णायक साक्ष्य के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) में जांच हेतु नहीं भेजा।
* मोबाइल की पहचान: आरोपितों से बरामद मोबाइल को भी मृतक का मोबाइल होना सिद्ध नहीं किया जा सका।
न्यायालय ने इन प्रमुख कमियों को देखते हुए पाया कि आरोपितों के ख़िलाफ़ दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त पुख्ता साक्ष्य मौजूद नहीं हैं, जिसके परिणामस्वरूप एडीजे-1 एम ऐड निय राजेन्द्र प्रसाद ने तीनों आरोपितों को बरी करने का आदेश दिया।
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