आगरा।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग प्रथम के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह ने 25 साल पुराने एक मामले में आखिरकार बिल्डर को ब्याज सहित बड़ी रकम का भुगतान करने के लिए बाध्य किया और वादी मुकदमा दिनेश चन्द्र शुक्ला को ₹1,69,163/- का एकाउंट पेई चेक सौंपकर बड़ी राहत प्रदान की।
क्या है मामला ?
मामले के अनुसार, दिनेश चन्द्र शुक्ला, निवासी कर्मयोगी एंक्लेव, कमला नगर, आगरा ने 3 जुलाई 1999 को मैसर्स सिंह एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर डॉ. एस.पी. सिंह के विरुद्ध उपभोक्ता आयोग प्रथम में मुकदमा दायर किया था।
* मकान का सौदा: वादी ने शास्त्री नगर, खंदारी, आगरा में निर्मित कॉलोनी में मकान लेने के लिए विपक्षी बिल्डर को एडवांस के रूप में ₹2,00,000/- का चेक और ₹10,000/- नगद दिए थे।
* पैसा वापस: कुछ समय बाद, बिल्डर ने बताया कि मकान निर्माण वाली जमीन के भू-स्वामी द्वारा अदालत में मुकदमा दायर करने के कारण वह मकान देने में असमर्थ है। वादी द्वारा पैसे वापस मांगने पर, बिल्डर ने केवल ₹1,85,000/- ही वापस किए।
* बकाया और मुकदमा: वादी ने बकाया ₹15,000/- का भुगतान न मिलने पर 03.07.1999 को मुकदमा दायर किया।

उपभोक्ता आयोग का फैसला (2009):
23 जुलाई 2009 को उपभोक्ता आयोग प्रथम ने फैसला सुनाया। चूंकि वादी ₹10,000/- नगद देने की रसीद दाखिल नहीं कर सका, इसलिए आयोग ने ₹2,00,000/- की धनराशि को आधार माना।
आयोग ने बिल्डर को निर्देश दिया कि वह:
* ₹2,00,000/- की धनराशि पर 1 मार्च 1993 से 10.06.1997 तक 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का भुगतान करे।
* शेष ₹15,000/- की मूल रकम पर, मुकदमा दायर करने की दिनांक 03.07.1999 से 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित भुगतान करे।
अपील हुई खारिज:
बिल्डर ने इस आदेश के विरुद्ध राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, लखनऊ में अपील (सं०-1449/2009) दायर की। राज्य आयोग ने 14 फरवरी 2024 को बिल्डर की अपील को खारिज करते हुए अधीनस्थ जिला आयोग के आदेश को यथावत रखा और पुष्टि की।

निष्पादन कार्यवाही और भुगतान:
राज्य आयोग से अपील खारिज होने के बाद, जिला उपभोक्ता आयोग प्रथम, आगरा ने निष्पादन वाद संख्या 09/2019 के तहत बिल्डर को नोटिस भेजकर ब्याज सहित रकम उपभोक्ता आयोग में जमा करने को बाध्य किया।
बिल्डर द्वारा ₹1,69,163/- की राशि आयोग के खाते में जमा करने पर, आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह ने राष्ट्रीय लोक अदालत में वादी को उक्त राशि का एकाउंट पेई चेक सौंपकर मामले की निष्पादन कार्यवाही समाप्त की।
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