आगरा।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-प्रथम, आगरा ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक फ्लैट खरीदार को राहत देते हुए बिल्डर और अन्य प्रतिपक्षियों को अग्रिम भुगतान की गई राशि ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है। आयोग ने सेवा में कमी और मानसिक पीड़ा के लिए भी मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
20.11.2025 को सुनाए गए इस निर्णय में, आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह ने श्रीमती अमिता आहूजा द्वारा दायर परिवाद को शस्यमंगलम इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा० लि० और दो अन्य सतीश चाहर और अतुल कुमार सिंह के विरुद्ध स्वीकार कर लिया। यह परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 35 के तहत दायर किया गया था।
मामला क्या था (The Case Details):
* खरीद का विवरण: परिवादिनी ने प्रतिपक्षीगण की आवासीय योजना ‘देवश्री अपार्टमेन्ट’ (देव नगर कॉलोनी, आगरा) में फ्लैट संख्या 504 (क्षेत्रफल 1720 वर्ग फुट, पंचम तल) 07.07.2010 को ₹30 लाख की कुल कीमत पर बुक कराया था।
* भुगतान: उन्होंने पंजीकृत विक्रय करार के माध्यम से बिल्डर को अग्रिम के रूप में ₹28,00,000/- (अट्ठाईस लाख रुपये) का भुगतान किया था।
* अनुबंध की शर्त: अनुबंध के अनुसार, बिल्डर को 12 माह की अवधि के भीतर फ्लैट का कब्जा प्रदान करना था और पंजीकृत बैनामा (विक्रय विलेख) निष्पादित कराना था।
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* बिल्डर की चूक: परिवादिनी का आरोप था कि प्रतिपक्षीगण ने निर्धारित अवधि के अंदर न तो फ्लैट का कब्जा दिया और न ही बैनामा निष्पादित कराया। इसके बजाय, उन्होंने 07.12.2011 को उसी फ्लैट (संख्या 504) को किसी अन्य व्यक्ति सुरेन्द्र कुमार गुप्ता को पंजीकृत बैनामे के ज़रिए बेच दिया।
* धन वापसी में देरी: जब परिवादिनी ने शेष धनराशि रोक ली और अग्रिम राशि वापस मांगी, तो बिल्डर ने इनकार कर दिया। अंत में, 10.11.2022 को जब अंतिम बार संपर्क किया गया, तो बिल्डर ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया।
बिल्डर का बचाव (Builder’s Defence):
* बिल्डर ने स्वीकार किया कि ₹30 लाख में फ्लैट बेचने का सौदा तय हुआ था और ₹28 लाख बतौर बयाना प्राप्त किए गए थे।
* उनका दावा था कि परिवादिनी ने अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं किया और नियत समय में बकाया धनराशि ₹2,00,000/- का भुगतान करके बैनामा कराने की कार्यवाही नहीं की।
* इस कारण, अनुबंध की शर्त संख्या 10 के अनुसार, परिवादिनी द्वारा जमा की गई ₹28 लाख की धनराशि जब्त कर ली गई, और 12 माह की सीमा समाप्त होने के बाद फ्लैट को सुरेन्द्र गुप्ता को नियमानुसार बेच दिया गया।
आयोग का निष्कर्ष और आदेश:(Commission’s Finding and Order)
आयोग ने परिवादिनी के पक्ष में निर्णय सुनाया और बिल्डर के तर्कों को ख़ारिज कर दिया।
* सेवा में कमी: आयोग ने पाया कि 12 माह की निर्धारित अवधि 06.07.2011 को समाप्त होनी थी। लेकिन बिल्डर ने इससे पहले ही, 27.06.2011 को, उसी फ्लैट को दूसरे व्यक्ति (सुरेन्द्र कुमार गुप्ता) को बेचने के लिए अनुबंध निष्पादित कर दिया।
इस आधार पर, आयोग ने माना कि बिल्डर ने स्वयं ही अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं किया और ₹28 लाख की अग्रिम राशि जब्त करने का प्रयास करके सेवा में कमी की है।
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* समय सीमा: आयोग ने माना कि वाद कालबाधित (Time-barred) नहीं है, क्योंकि बिल्डर द्वारा भुगतान में टाल-मटोल किया गया, चेक अनादरित (बाउंस) हुए, और अंतिम बार 10.11.2022 को भुगतान करने से इंकार किया गया। इसलिए वाद का कारण निरंतर जारी रहा।
आदेश (Order): आयोग ने प्रतिपक्षीगण को आदेश की दिनांक से 45 दिन के भीतर निम्नलिखित राशि लौटाने का आदेश दिया:
* मूल अग्रिम धनराशि: ₹28,00,000/- (अट्ठाईस लाख रुपये), जिस पर 07.07.2010 से 8% वार्षिक साधारण ब्याज।
* स्टाम्प डियूटी: विक्रय अनुबंध पत्र के लिए अदा की गई ₹60,000/- पर भी 07.07.2010 से 8% वार्षिक साधारण ब्याज।
* मानसिक पीड़ा क्षतिपूर्ति: ₹1,00,000/- (एक लाख रुपये)।
* वाद व्यय: ₹20,000/- (बीस हजार रुपये)।
* चेतावनी: यदि बिल्डर 45 दिनों के भीतर भुगतान नहीं करते हैं, तो उन्हें सम्पूर्ण धनराशि पर 8% के बजाय 12% वार्षिक साधारण ब्याज देना होगा
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