आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा है कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो इसे बाद में दुष्कर्म (Rape) नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकलपीठ ने बरेली के इज्जतनगर थाने में दर्ज केस की कार्यवाही और आरोप पत्र को रद्द करते हुए आरोपी नीरज कुमार व अन्य को राहत प्रदान की है।
मामले का संक्षिप्त विवरण:
पीड़िता, जो एक विवाहित महिला है और जिसके पति सेना में कार्यरत हैं, ने आरोप लगाया था कि पीसीएस (PCS) की तैयारी के दौरान एक मित्र ने उसे अपने भाई नीरज से मिलवाया।
आरोप के अनुसार, नीरज ने जन्मदिन की पार्टी के बहाने होटल बुलाकर दुष्कर्म किया और अश्लील वीडियो बना लिए, जिसके आधार पर उसे ब्लैकमेल कर बार-बार शारीरिक संबंध बनाए गए। महिला ने दिसंबर 2024 में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:
न्यायालय ने साक्ष्यों और परिस्थितियों का अवलोकन करने के बाद निम्नलिखित बिंदु स्पष्ट किए:
* सहमति और देरी: कोर्ट ने कहा कि यदि महिला को लगता था कि शादी का वादा झूठा है या वह दबाव में थी, तो उसने 1 साल 3 महीने तक पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की? इतनी लंबी खामोशी ‘सहमति से संबंध’ की ओर संकेत करती है।
* बयानों में विरोधाभास: पीड़िता ने पहले स्वेच्छा से संबंध की बात कही और बाद में दबाव का आरोप लगाया। कोर्ट ने कहा कि एक विवाहित महिला का इतने लंबे समय तक दबाव में संबंध बनाना तर्कसंगत नहीं लगता।
* डिजिटल साक्ष्य: वाट्सएप चैट से यह सिद्ध हुआ कि दोनों के बीच गहरे संबंध थे और पीड़िता आरोपी से ‘गाइडेंस’ लेती रही थी। कोर्ट ने पाया कि फोटो वायरल करने या ब्लैकमेल करने का कोई ठोस सबूत उपलब्ध नहीं है।
* सुप्रीम कोर्ट के नजीर का हवाला: अदालत ने प्रशांत बनाम दिल्ली राज्य (2024) के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि लंबे समय तक बने रहे संबंधों में ‘दबाव’ की थ्योरी को समझना मुश्किल है।
कानूनी कार्यवाही:
अपीलार्थियों (आरोपियों) ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत याचिका दायर कर केस रद्द करने की मांग की थी।
कोर्ट ने माना कि आरोपियों के खिलाफ ऐसे कोई साक्ष्य नहीं हैं जो उन्हें इस मामले में अपराधी सिद्ध कर सकें, जिसके बाद संपूर्ण केस कार्यवाही को निरस्त कर दिया गया।
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