आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश शहरी किराया नियंत्रण अधिनियम, 2021 के तहत गठित ‘किराया अधिकरण’ (Rent Tribunal) एक सिविल कोर्ट की श्रेणी में आता है, न कि कोई कार्यपालक प्राधिकारी या विशिष्ट संस्था।
मुख्य निर्णय: अनुच्छेद 226 बनाम 227:
न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने गाजियाबाद के रविंद्र कुमार एवं आठ अन्य व्यक्तियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
* अनुच्छेद 226: चूंकि किराया अधिकरण एक सिविल कोर्ट है, इसलिए इसके आदेश के विरुद्ध संविधान के अनुच्छेद 226 (रिट अधिकारिता) के तहत याचिका विचारणीय नहीं है।
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* अनुच्छेद 227: अधिकरण के निर्णयों को संविधान के अनुच्छेद 227 (अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति) के तहत ही चुनौती दी जा सकती है।
न्यायालय का तर्क:
कोर्ट ने रेखांकित किया कि किराया न्यायाधिकरण की अध्यक्षता जिला न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित अपर जिला जज करते हैं।
यह पूर्णतः एक न्यायिक प्रक्रिया है, इसलिए इसे प्रशासनिक या कार्यपालक प्राधिकारी नहीं माना जा सकता।
“किराया अधिकरण एक सिविल कोर्ट है। अतः इसके आदेशों के विरुद्ध अनुच्छेद 227 के तहत दी गई कानूनी प्रक्रिया का ही पालन किया जाना चाहिए।” — हाई कोर्ट
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आगे की कार्रवाई:
हाई कोर्ट ने याचियों को राहत देते हुए एक सप्ताह का समय दिया है ताकि वे अपनी वर्तमान याचिका में आवश्यक संशोधन (Amending the petition from Art. 226 to Art. 227) कर सकें।
मामले की अगली सुनवाई 26 फरवरी 2026 को नियत की गई है।
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