आगरा के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग प्रथम ने स्टार हेल्थ इन्श्योरेंस कंपनी को दिया झटका

उपभोक्ता मामले न्यायालय मुख्य सुर्खियां
पॉलिसी रिन्यूअल में ‘ब्रेक पीरियड’ का बहाना बना क्लेम रोकना सेवा में कमी, उपभोक्ता आयोग ने सुनाया फैसला

आगरा।

जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-प्रथम ने स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी के विरुद्ध सेवा में कमी का दोषी पाते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

आयोग ने बीमा कंपनी को आदेश दिया है कि वह परिवादी को इलाज के खर्च की पूरी धनराशि ब्याज सहित अदा करे।

जानिये क्या था मामला ?

आगरा निवासी राजेंद्र गुप्ता ‘धीरज’ की पत्नी, स्वर्गीय श्रीमती निर्मला गुप्ता ने वर्ष 2014 में स्टार हेल्थ से एक स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी खरीदी थी, जिसे वे लगातार रिन्यू करा रही थीं।

मार्च 2019 में अचानक बीमार होने पर उन्हें नोएडा के मेट्रो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहाँ इलाज पर ₹1,02,691/- का खर्च आया।

जब राजेंद्र गुप्ता ने बीमा कंपनी के समक्ष क्लेम प्रस्तुत किया, तो कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि पॉलिसी में 3 दिन का ‘ब्रेक’ (अंतराल) था, जिसके कारण ग्रेस पीरियड में हुई बीमारी ‘पहले से मौजूद बीमारी’ (Pre-existing disease) की श्रेणी में आती है।

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आयोग की कड़ी टिप्पणी:

मामले की सुनवाई के दौरान अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह की पीठ ने पाया कि:

* सूचना का अभाव: बीमा कंपनी ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो कि उन्होंने पॉलिसी धारक को रिन्यूअल के लिए पहले से कोई सूचना भेजी थी।

* निरंतरता का आधार: पॉलिसी वर्ष 2014 से लगातार चल रही थी। जैसे ही रिन्यूअल की जानकारी हुई, परिवादी ने तत्काल प्रीमियम जमा कर दिया और कंपनी ने उसे स्वीकार कर पॉलिसी रिन्यू भी कर दी।

* गलत व्याख्या: आयोग ने स्पष्ट किया कि पॉलिसी की शर्तों (शर्त संख्या 7) का हवाला देकर क्लेम रोकना ‘अनुचित व्यापार व्यवहार’ और ‘सेवा में कमी’ के दायरे में आता है।

आयोग का आदेश:

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न्यायालय ने परिवादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:

* चिकित्सा क्षतिपूर्ति: इलाज की राशि ₹1,02,691/- का भुगतान करें।

* ब्याज: उपरोक्त राशि पर परिवाद दाखिल करने की तिथि से 6% वार्षिक साधारण ब्याज देय होगा।

* मानसिक पीड़ा व वाद व्यय: मानसिक उत्पीड़न के लिए ₹10,000/- और कानूनी खर्च के रूप में ₹5,000/- का भुगतान अलग से करना होगा।

आयोग ने कहा कि यह संपूर्ण भुगतान निर्णय के 45 दिनों के भीतर करना अनिवार्य है। यदि कंपनी निर्धारित समय में भुगतान करने में विफल रहती है, तो ब्याज की दर 6% से बढ़ाकर 9% वार्षिक कर दी जाएगी।

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विवेक कुमार जैन
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