आगरा:
उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और मानवाधिकारों के उल्लंघन के एक गंभीर मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) माननीय मृत्युंजय श्रीवास्तव ने कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायालय ने आरोपी के शरीर पर मिली चोटों को गिरफ्तारी मेमो में छिपाने पर थानाध्यक्ष सिकंदरा को कारण बताओ नोटिस जारी कर व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होकर स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया है।
क्या है पूरा मामला ?
मामला थाना सिकंदरा में दर्ज अपराध संख्या 420/23 (अमानत में खयानत, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र) से जुड़ा है। इस मामले में पुलिस ने यश खिरवार उर्फ यशपाल (निवासी दौरेठा, शाहगंज) को गिरफ्तार कर 8 फरवरी 2026 को न्यायालय में पेश किया था।
गिरफ्तारी मेमो बनाम मेडिकल रिपोर्ट की विसंगति
आरोपी के अधिवक्ता प्रवेश सोलंकी ने न्यायालय के समक्ष गंभीर आरोप लगाते हुए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया।
अधिवक्ता के मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:
* अवैध हिरासत: पुलिस ने आरोपी को 7 फरवरी को उसके घर से उठाया था, लेकिन उसकी गिरफ्तारी अगले दिन 8 फरवरी को दिखाई गई।
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* तथ्यों को छिपाना: पुलिस द्वारा तैयार गिरफ्तारी मेमो में आरोपी के शरीर पर ‘कोई चोट नहीं’ दर्शाई गई थी।
* मेडिकल साक्ष्य: जब जिला अस्पताल में आरोपी का डॉक्टरी परीक्षण (Medical Examination) हुआ, तो वहां डॉक्टर ने उसके शरीर पर 5 गंभीर चोटें पाईं और उन्हें रिपोर्ट में दर्ज किया।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी:
सीजेएम माननीय मृत्युंजय श्रीवास्तव ने पुलिस के गिरफ्तारी मेमो और जिला अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट का बारीकी से मिलान किया। दोनों प्रपत्रों में मिली इस भारी असंगति (Discrepancy) को न्यायालय ने अत्यंत गंभीर प्रकृति का माना।
न्यायालय ने इसे पुलिस की पारदर्शिता पर सवालिया निशान मानते हुए थानाध्यक्ष सिकंदरा को नोटिस प्रेषित किया है।
आदेश के मुताबिक, थानाध्यक्ष को नियत तिथि पर स्वयं अदालत में हाजिर होना होगा और यह बताना होगा कि मेडिकल में पाई गई चोटों को गिरफ्तारी मेमो में क्यों नहीं दर्शाया गया ?
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