आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में हुए दंगों के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने दंगे के आरोपी और मौलाना तौकीर रजा के सहयोगी रेहान की जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि ‘सिर तन से जुदा’ जैसे नारे लगाना केवल दंगा भड़काना नहीं, बल्कि सीधे तौर पर भारत सरकार और देश की अखंडता को चुनौती देना है।
न्यायालय की तल्ख टिप्पणी:
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जमानत अर्जी नामंजूर की।

कोर्ट ने अपने फैसले के पैरा 12 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया:
* संप्रभुता पर हमला: याची द्वारा लगाया गया नारा “गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सिर तन से जुदा” न केवल कानून के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए भी खतरा है।
* सशस्त्र विद्रोह की उकसावा: कोर्ट ने माना कि ऐसे नारे लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाते हैं।
* इस्लाम के विरुद्ध: न्यायालय ने यह भी कहा कि यह कृत्य न केवल भारतीय दंड विधान (धारा 152 BNS) के तहत दंडनीय है, बल्कि यह इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी विपरीत है।
जानिए क्या है पूरा मामला ?
यह मामला 26 सितंबर को बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ जुलूस के दौरान हुए दंगों से जुड़ा है। आरोपी रेहान के खिलाफ बरेली के कोतवाली पुलिस स्टेशन में दंगा भड़काने और भड़काऊ नारेबाजी करने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई थी।
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कानूनी बहस:
* विरोध: एडिशनल एडवोकेट जनरल अनूप त्रिवेदी ने जमानत अर्जी का पुरजोर विरोध करते हुए इसे समाज और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा बताया।
* बचाव: याची की ओर से अधिवक्ता अखिलेश कुमार द्विवेदी ने अपना पक्ष रखा, जिसे कोर्ट ने अपराध की प्रकृति को देखते हुए स्वीकार नहीं किया।
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