नई दिल्ली:
उच्चतम न्यायालय ने मोटर दुर्घटना दावा मामलों में मुआवज़ा निर्धारित करने के एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू पर पुनर्विचार की आवश्यकता की ओर इशारा किया है।
जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की खंडपीठ ने National Insurance Co. Ltd. बनाम Pranay Sethi (2017) के संविधान पीठ के फैसले के उस हिस्से पर “असहजता” और “शंका” व्यक्त की है, जो ‘प्रेम और स्नेह की हानि’ (Loss of Love and Affection) को एक स्वतंत्र मुआवज़ा मद के रूप में स्वीकार करने से मना करता है।
क्या है पूरा विवाद ?
अदालत उस विधिक स्थिति पर चर्चा कर रही थी जहाँ 2017 के Pranay Sethi फैसले में गैर-आर्थिक क्षति (Non-Pecuniary Damages) को केवल तीन श्रेणियों तक सीमित कर दिया गया था:
* संपत्ति की हानि (Loss of Estate)
* सहचर्य/संग-साथ की हानि (Loss of Consortium)
* अंतिम संस्कार खर्च (Funeral Expenses)
संविधान पीठ ने ‘प्रेम और स्नेह की हानि’ को एक अलग मद के रूप में देने से इंकार कर दिया था। वर्तमान खंडपीठ का तर्क है कि यदि अदालतें ‘भविष्य की संभावनाओं’ (Future Prospects) जैसे आर्थिक पहलुओं को न्यायिक व्याख्या से विकसित कर सकती हैं, तो परिजनों की “भावनात्मक वंचना” को एक स्वतंत्र श्रेणी क्यों नहीं माना जा सकता?
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:
जस्टिस दिपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए निर्णय में मोटर वाहन अधिनियम के कल्याणकारी स्वरूप पर जोर दिया गया:
“मोटर वाहन अधिनियम का अध्याय XII एक सामाजिक कल्याणकारी कानून है। घातक दुर्घटना में अपनों को खोने वाली भावनात्मक क्षति को मुआवज़े की गणना से बाहर रखना या उसे सीमित करना एक वैचारिक तनाव पैदा करता है।”
खंडपीठ ने कहा कि हालांकि वे संविधान पीठ के फैसले से बंधे हुए हैं, लेकिन उन्हें यह समझने में कठिनाई हो रही है कि भावनात्मक क्षति को अलग पहचान क्यों नहीं मिलनी चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि और हाईकोर्ट का फैसला:
यह मामला 2011 में हुई एक सड़क दुर्घटना से संबंधित है जिसमें 37 वर्षीय व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी।
* MACT (अधिकरण): 2012 में ₹9.37 लाख का मुआवज़ा तय किया।
* मद्रास हाईकोर्ट: मुआवज़ा बढ़ाकर ₹10.51 लाख किया और इसमें ₹60,000/- ‘प्रेम और स्नेह की हानि’ के मद में जोड़े।
* सुप्रीम कोर्ट में अपील: आश्रितों ने मुआवज़ा बढ़ाने की मांग की, जबकि बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट द्वारा ‘प्रेम और स्नेह’ के लिए अलग से दिए गए ₹60,000 पर आपत्ति जताई।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी मर्यादा बनाए रखते हुए Pranay Sethi के सिद्धांत का पालन किया लेकिन मुआवज़े की गणना में मानवीय दृष्टिकोण अपनाया:
* स्वतंत्र मद को हटाया: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Rajesh बनाम Rajbir Singh (2013) का फैसला, जो ‘प्रेम और स्नेह’ को स्वतंत्र मद मानता था, अब प्रभावी नहीं है। इसलिए ₹60,000/- की उस स्वतंत्र राशि को हटा दिया गया।
* Consortium का विस्तार: कोर्ट ने Magma General Insurance (2018) का हवाला देते हुए कहा कि ‘Consortium’ केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं है। इसमें अभिभावकीय (Parental) और संतानगत (Filial) सहचर्य भी शामिल है।
* मुआवज़े में वृद्धि: ‘प्रेम और स्नेह’ की क्षति को ‘Loss of Consortium’ के व्यापक दायरे में समाहित मानते हुए, कोर्ट ने कुल मुआवज़े को बढ़ाकर ₹20.80 लाख कर दिया।
निष्कर्ष का महत्व:
यह फैसला भविष्य के लिए एक विधिक आधार तैयार करता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक कोई बड़ी पीठ Pranay Sethi के फैसले की समीक्षा नहीं करती, तब तक ‘प्रेम और स्नेह की हानि’ को अलग से नहीं लिखा जा सकता, लेकिन इसे ‘Consortium’ (सहचर्य) के तहत प्रभावी ढंग से शामिल किया जाना चाहिए ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके।
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