42 साल बाद डकैती के आरोपियों को मिला न्याय,साक्ष्यों के अभाव में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया बरी

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आगरा/प्रयागराज ।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने डकैती के एक ऐतिहासिक मामले में फैसला सुनाते हुए तीन जीवित आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है।

न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष चार दशक पुराने इस मामले में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा।

न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने बदायूं की सत्र अदालत द्वारा 1983 में सुनाई गई सजा के आदेश को रद्द करते हुए यह निर्णय दिया।

मामले की पृष्ठभूमि:

यह मामला बदायूं जिले के उझानी थाना क्षेत्र का है, जहाँ 26/27 जुलाई 1982 की रात धनपाल नामक व्यक्ति के घर डकैती पड़ी थी।

आरोप था कि गाँव के ही सात लोगों ने घर में घुसकर मारपीट की और ₹3,000/- नकद व चांदी के जेवरात लूट लिए।

29 अगस्त 1983 को विशेष सत्र न्यायाधीश, बदायूं ने सभी सात आरोपियों को दोषी करार देते हुए 5 से 7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

इस आदेश के खिलाफ दोषियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

लचर पैरवी और साक्ष्यों का अभाव:

अपील पर सुनवाई के दौरान अदालत ने अभियोजन की कहानी में कई गंभीर खामियां पाईं:

* मेडिकल रिपोर्ट में विरोधाभास: गवाहों के बयानों और चोटों की मेडिकल रिपोर्ट में सामंजस्य नहीं था।

* बरामदगी की विफलता: पुलिस घटना के बाद न तो लूटा गया माल बरामद कर सकी और न ही कोई ठोस भौतिक साक्ष्य जुटा पाई।

* संदिग्ध शिनाख्त: आरोपियों की पहचान की प्रक्रिया (Identification Parade) को भी कोर्ट ने संदिग्ध माना।

* पुरानी रंजिश: न्यायालय ने इस संभावना को भी खारिज नहीं किया कि पुरानी रंजिश के चलते आरोपियों को झूठा फंसाया गया हो।

न्यायालय का निर्णय:

सुनवाई के दौरान सात में से चार आरोपियों की मृत्यु हो चुकी थी, जिसके कारण उनके विरुद्ध अपील स्वतः समाप्त हो गई।

शेष तीन जीवित आरोपी अली हसन, हरपाल और लतूरी जो अब 70 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग हैं, उन्हें अदालत ने ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए बरी कर दिया।

अदालत की टिप्पणी:

“जब गवाहों के बयानों में विरोधाभास हो और विवेचना में गंभीर खामियां हों, तो सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।”

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मनीष वर्मा
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