आगरा/नई दिल्ली: ४ जून ।
दिल्ली की साकेत कोर्ट ने एक 86 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने बेटे और बहू पर हत्या के प्रयास (आईपीसी की धारा 307) का आरोप जोड़ने की मांग की थी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-03 (दक्षिण पूर्व) माननीय लवलीन की अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें ‘हत्या के प्रयास’ के आरोप को जोड़ने का आवेदन “समय से पहले” (premature) बताते हुए खारिज कर दिया गया था।
यह मामला एफआईआर नंबर 389/2021 से जुड़ा है, जो पीएस सनलाइट कॉलोनी में दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता अजीत कौर ने अपने बेटे हरबिंदर सिंह और बहू गीता पर मारपीट और गलत तरीके से रोकने का आरोप लगाया था। पुलिस जांच के बाद, अभियुक्तों के खिलाफ आईपीसी की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और 341 (गलत तरीके से रोकना) के तहत चार्जशीट दायर की गई थी। अजीत कौर की मेडिकल लीगल सर्टिफिकेट (एमएलसी ) में भी ‘साधारण’ चोटें ही दर्ज थीं।
24 जून, 2022 को मजिस्ट्रेट ने अपराधों का संज्ञान लिया और अभियुक्तों को तलब किया गया, जिसके बाद 23 नवंबर, 2022 को उनके खिलाफ धारा 323/341/34 के तहत आरोप तय किए गए। हालांकि, 23 अगस्त, 2023 को अजीत कौर ने दंड प्रक्रिया संहिता सीआरपीसी की धारा 216 के तहत एक आवेदन दायर कर धारा 307 (हत्या का प्रयास) के आरोप को जोड़ने की मांग की। मजिस्ट्रेट अदालत ने 26 सितंबर, 2024 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया था कि अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह की जांच अभी तक नहीं की गई है और कोई नई सामग्री रिकॉर्ड में नहीं आई है, इसलिए यह आवेदन “समय से पहले” है।
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अजीत कौर ने अपनी पुनरीक्षण याचिका में तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने अभियुक्तों के इरादे को उनकी 86 वर्ष की आयु और संपत्ति विवादों को देखते हुए समझने में गलती की है। उन्होंने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने धारा 216 सीआरपीसी के प्रावधानों की अनदेखी की, जो ‘निर्णय सुनाए जाने से पहले किसी भी समय’ आरोप में बदलाव या जोड़ने की अनुमति देता है।
हालांकि, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश माननीय लवलीन ने अपने निर्णय में मजिस्ट्रेट के आदेश को सही ठहराया। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि आरोप तय होने के बाद से कोई नया सबूत सामने नहीं आया है। न्यायालय ने कहा कि नए सबूतों के अभाव में धारा 216 सीआरपीसी का प्रयोग करना मजिस्ट्रेट के पिछले आदेशों की समीक्षा करने जैसा होगा, जिसकी अनुमति नहीं है।
न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश “मनमाना, विकृत या तर्कहीन नहीं” है और इसमें कोई “न्यायिक त्रुटि” नहीं है जिससे कोई अन्याय हुआ हो। परिणामस्वरूप, पुनरीक्षण याचिका को “किसी भी योग्यता से रहित” बताते हुए खारिज कर दिया गया।
प्रतिवादियों की तरफ़ से प्रभावी पैरवी दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. शर्मा और मोहित शर्मा ने की।
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