आगरा /नई दिल्ली 11 सितंबर।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मेडिकल कॉलेज के विस्तार के लिए मंजूरी देने को लेकर चुनौती देने के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) की निंदा की। कोर्ट ने यह याद दिलाया कि एनएमसी को राज्य का अंग होने के नाते उचित और निष्पक्ष तरीके से काम करना चाहिए, कोर्ट ने उस पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने टिप्पणी की,
“प्रथम दृष्टया, हम पाते हैं कि एनएमसी का रवैया आदर्श वादी का नहीं है। एनएमसी राज्य का अंग है और उससे निष्पक्ष और उचित तरीके से काम करने की उम्मीद की जाती है।”
Also Read - राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का मदरसों में बच्चो को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा न मिलने को लेकर सर्वोच्च अदालत में सुनवाई आजएनएमसी ने केरल हाईकोर्ट के उस निर्देश के खिलाफ विशेष अनुमति याचिका दायर की, जिसमें कॉलेज द्वारा अंडरटेकिंग दाखिल करने पर केएमसीटी मेडिकल कॉलेज को अनुमति देने का निर्देश दिया गया।
मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड ( एमएआरबी ) द्वारा जारी दिनांक 27.02.2023 के पत्र द्वारा मेडिकल कॉलेज को शैक्षणिक वर्ष 2023-24 के लिए सीटों की संख्या 150 से बढ़ाकर 250 करने की शुरुआत में मंजूरी दी गई थी। हालांकि, एमएआरबी द्वारा जारी दिनांक 05.04.2023 के बाद के पत्र द्वारा इसे वापस ले लिया गया।
दिनांक 29.06.2024 के अस्वीकृति पत्र द्वारा एमएआरबी ने प्रतिवादी-मेडिकल कॉलेज को दो कारण बताते हुए अस्वीकृति दी थी: (i) संबद्धता प्रमाणपत्र (सीओए) प्रस्तुत नहीं किया गया और (ii) मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
न्यायालय ने कहा कि मामला न्यायालय में विचाराधीन होने के कारण प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। यदि एनएमसी को कोई संदेह था तो वह स्पष्ट रूप से संबंधित न्यायालय से संपर्क कर स्पष्टीकरण मांग सकता था।
साथ ही न्यायालय ने नोट किया कि सीओए 12.08.2024 को दिया गया। हालांकि, एनएमसी ने तर्क दिया कि अनुमति देने पर वार्षिक आधार पर विचार किया जाना चाहिए। पिछली अस्वीकृति शैक्षणिक वर्ष 2023-2024 के लिए थी, जबकि वर्तमान वर्ष में एनएमसी शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 से संबंधित है।
यह प्रस्तुत किया गया कि जहां तक शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 का संबंध है, कोई निरीक्षण नहीं किया गया। इसलिए हाईकोर्ट द्वारा आदेश पारित करना उचित नहीं था, जिसे इस न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, खासकर इस तथ्य के मद्देनजर कि कॉलेज पिछले 18 वर्षों से चल रहा था।
Also Read - नाबालिग पार्टनर के साथ लिव-इन में रहने वाले जोड़े को उनके धर्म के बावजूद सुरक्षा नहीं मिल सकती : पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्टन्यायालय ने कहा,
“किसी पक्ष को अनुमति लेने के लिए न्यायालय से न्यायालय तक दौड़ाना, खास तौर पर तब जब संबंधित संस्थान कोई नया संस्थान नहीं है और पिछले 18 वर्षों से चल रहा है, हमारे विचार में संस्थान को परेशान करने का एक प्रयास मात्र है। खास तौर पर जब शैक्षणिक वर्ष 2023-2024 के लिए पहले दी गई मंजूरी वापस ले ली गई तो सीओए न दिए जाने के अलावा कोई कमी नहीं बताई गई।”
एनएमसी की याचिका को “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” करार देते हुए न्यायालय ने इसे 10 लाख रुपये की लागत के साथ खारिज किया। 5,00,000/- रुपये का जुर्माना सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन में जमा किया जाएगा, जिसका उपयोग लाइब्रेरी के उद्देश्य से किया जाएगा। 5,00,000/- रुपये का जुर्माना सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन एडवोकेट्स वेलफेयर फंड में जमा किया जाएगा।
केस टाइटल: नेशनल मेडिकल कमीशन बनाम प्रिंसिपल केएमसीटी मेडिकल कॉलेज
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